*जब नेतृत्व अहंकार में बहरे हो जाए, तब समाज को स्वर ऊंचा करना ही पड़ता है*
✒️ *अक्षय जैन*
समाज केवल संस्थाओं से नहीं चलता, वह विश्वास से चलता है। पदों से नहीं टिकता, वह प्रतिष्ठा से टिकता है। और प्रतिष्ठा केवल अधिकार से नहीं, आचरण से अर्जित होती है। यही कारण है कि किसी भी सामाजिक नेतृत्व की पहली और अंतिम कसौटी उसका व्यवहार, उसका संतुलन और उसका समभाव होता है। जहां नेतृत्व समन्वयकारी होता है, वहां समाज सहजता से आगे बढ़ता है; लेकिन जहां नेतृत्व अहंकार का वस्त्र पहन ले, वहां असहमति आक्रोश में बदलने लगती है।
शुचिता, मर्यादा और संयम निस्संदेह किसी भी समाज की आत्मा हैं। संवाद की भाषा सौम्य हो, आलोचना की शैली शालीन हो और मतभेदों में भी सम्मान बचा रहे , यह आदर्श स्थिति है। लेकिन समाज का अनुभव यह भी कहता है कि जब नेतृत्व सुनना बंद कर देता है, जब संवाद के दरवाजे भीतर से बंद कर दिए जाते हैं, जब पद संवेदनशीलता के स्थान पर कठोरता का कवच पहन लेते हैं, तब केवल विनम्र शब्द पर्याप्त नहीं रहते। तब समाज को अपनी पीड़ा अधिक स्पष्ट, अधिक दृढ़ और कभी-कभी अधिक तीखे स्वर में कहनी पड़ती है।
यह तीखापन अपमान का नहीं, प्रतिरोध का स्वर होता है। यह कटुता किसी व्यक्ति के लिए नहीं, उस प्रवृत्ति के विरुद्ध होती है जो नेतृत्व को उत्तरदायित्व से हटाकर अहंकार की दिशा में ले जाती है। समाज तब कठोर भाषा नहीं बोलता, वह कड़वी दवा देता है ताकि नेतृत्व को यह स्मरण रहे कि वह समाज से ऊपर नहीं, समाज के प्रति जवाबदेह है।
नेतृत्व का अर्थ केवल निर्णय लेना नहीं, सबको साथ लेकर चलना है। यदि नेतृत्व एक पक्ष को सुनकर दूसरे को उपेक्षित करे, यदि संवाद की जगह निर्देश और समन्वय की जगह मनमानी स्थापित होने लगे, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं रहती, यह सामाजिक असंतुलन का कारण बनती है। पक्षपात, पूर्वाग्रह और एकांगी व्यवहार किसी भी संस्था की विश्वसनीयता को भीतर से खोखला कर देते हैं। समाज की सबसे बड़ी पूंजी विश्वास है, और विश्वास वहीं बचता है जहां नेतृत्व निष्पक्ष दिखे, संतुलित सुने और विनम्र बोले।
समाज में अहंकार से कभी संगठन नहीं बनते। संगठन समभाव से बनते हैं। संवाद से बनते हैं। परस्पर सम्मान से बनते हैं। सामाजिक सरोकार आदेश से नहीं, सहभागिता से पल्लवित होते हैं। कोई भी नेतृत्व कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, यदि उसमें सुनने का धैर्य नहीं और स्वीकार करने का साहस नहीं, तो वह समाज को जोड़ नहीं सकता। वह केवल व्यवस्था चला सकता है, विश्वास नहीं।
इसीलिए समाज में नेतृत्व की मनमानी, पक्षपाती व्यवहार और पूर्वाग्रही आचरण को सामान्य मानकर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी समाज की सजगता इसी में है कि वह व्यक्ति और पद के बीच का अंतर समझे। पद का सम्मान हो, पर प्रश्न करने का अधिकार भी बना रहे। नेतृत्व का आदर हो, पर उसके निर्णयों की समीक्षा का साहस भी बचा रहे।
समाज तब परिपक्व माना जाता है जब वह चुप्पी को शिष्टता और प्रतिरोध को उद्दंडता मानने की भूल नहीं करता। कभी-कभी मौन कायरता बन जाता है और मुखरता ही सामाजिक उत्तरदायित्व। ऐसे समय में स्वर ऊंचा करना असभ्यता नहीं, समाज के आत्मसम्मान की रक्षा होता है।
अंततः समाज को यह तय करना होगा कि उसे अहंकार से संचालित नेतृत्व चाहिए या समन्वय से संचालित व्यवस्था। क्योंकि नेतृत्व की असली गरिमा उसके पद में नहीं, उसके भीतर बसे विनम्र विवेक में होती है। और जहां विवेक सो जाता है, वहां समाज को आवाज बनना ही पड़ता है।






