जब गुलजारी लाल नंदा आश्रम में झाड़ू लगा रहे थे,और एक बालक ने यह कह दिया था

जब गुलजारी लाल नंदा आश्रम में झाड़ू लगा रहे थे,और एक बालक ने यह कह दिया था…
_भारत के दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे स्व. गुलजारीलाल नंदा भारत रत्न और पद्मविभूषण से विभूषित होने के बाद भी अहंकार से दूर रहने के लिए किस तरह प्रयत्नशील रहते थे, इसका एक संस्मरण बड़ा ही दुर्लभ है।
यह 1979-80 के दशक की घटना है। इसे सुन या जानकर कोई भी व्यक्ति उनके प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हुए बिना रह नहीं सकता। मां आनंदमयी के आश्रम में शंकराचार्य हॉल में शंकराचार्य जी मूर्ति के समक्ष श्री पदमप्रकाश जी पूजा कर रहे थे। उनके पास ही हॉल की रैलिंग पर एक बालक जो आनंदमयी आश्रम में मां को रामायण पाठ सुनाया करता था, वह एक बूढ़े को देख रहा था। कुर्ता-पजामा पहने, आंखों पर चश्मा लगाए वह बूढ़ा आश्रम में झाड़ू लगा रहा था। कुछ कचरा वहां छूट रहा था। सहसा, इस बालक ने उस बूढ़े को टोका और कहा बाबा आपने कुछ कचरा छोड़ दिया है। वह बूढ़ा पीछे मुड़ा और बालक की ओर देखकर मुस्कुरा भर दिया। इस घटना को पदमप्रकाश जी देख रहे थे। बाद में उन्होंने उस बालक से कहा-तुम जानते हो ये बूढ़ा कौन है, जो झाड़ू लगा रहा था। बालक ने अनभिज्ञता प्रकट की तो उन्होंने बताया ये भारत के पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा हैं।
उसी दिन शाम को संयोगवश वह बालक और पदमप्रकाश जी गंगा किनारे एक घाट पर बैठे थे। वह बूढ़ा भी वहीं दिखाई दिया। इस नन्हें बालक के मन में उस बूढ़े के प्रति जितनी श्रद्धा थी उससे कहीं अधिक ये उत्सुकता थी कि क्या वे सचमुच नंदा जी ही हैं। उस बूढ़े को सामने देख बालक ने बड़े कौतूहल से पूछा… क्या आप ही गुलजारीलाल नंदा हैं? उन्होंने इशारे से अपने पास बुलाया और दोनों को अपने अंक में भर लिया, छाती से चिपका लिया और कहा हां, मैं ही गुलजारीलाल नंदा हूं। उन्होंने पूछा तुम पढ़ते हो, बालक ने कहा हां ग्याहरवीं में पढ़ रहे हैं और मां को पाठ भी सुनाते हैं। नंदा जी इस बालक से बड़े प्रभावित हुए और आशीषभरे भाव से कहा मां की खूब सेवा किया करो। ये बालक अब मानस भूषण संत सुमनभाई के नाम से विख्यात है और श्रीरामचरितमानस गा कर देश दुनिया को धर्म और सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहा है।
सभी जानते हैं कि गुलजारीलाल नंदा गृहमंत्री और रेलमंत्री भी रहे। 13-13 दिनों के लिए वे क्रमशः 1964 और 1967 में कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने और विपरीत परिस्थितियों में देश की कमान संभाली लेकिन सरकारी सुविधाओं का कभी निजी उपयोग नहीं किया। एक बार उनकी बेटी पुष्पा दिल्ली आवास से सरकारी गाड़ी में बैठकर यूनिवर्सिटी का फॉर्म भरने चली गई थीं। नंदा जी को पता चला तो वे न केवल नाराज हुए वरन गाड़ी का खर्च अपने पास से भरा। वे सच्चे अर्थों में भारत रत्न थे, जो आश्रम में रहकर भी सेवाभाव से झाड़ू लगाते थे।

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