स्टेट प्रेस क्लब, म. प्र. द्वारा जल संकट से जल सुरक्षा विषय पर परिचर्चा आयोजित
नर्मदा जल के असमान वितरण से और गहराएगा जल संकट
जल के कुपबंधन को रोकने के लिए ठोस नीति बनाना जरूरी है
इंदौर। इस वर्ष मानसून में औसत से कम वर्षा होने से शहर में जल संकट विकराल रूप लेने वाला है। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल निगम प्रशासन को ही नहीं बल्कि हर व्यक्ति का दायित्व है कि वह जल का सही उपयोग करे। यह काम गृहणियां भी अच्छे से कर सकती हैं। वर्षा जल संग्रहण से अधिक जरूरी है जल का सुनियोजित प्रबंधन करना। इंदौर शहर की प्यास 70 किलोमीटर दूर से आने वाले नर्मदा जल से आज भी बुझाई जा रही है। हम सब आज भी नर्मदा नदी के जल पर निर्भर हैं। इंदौर में नर्मदा का जितना पानी आता है उसका सही तरीके से वितरण आज भी नहीं हो रहा है। इस वजह से जल समस्या बनी हुई है। जरूरी है कि शहर का प्रत्येक नागरिक जल की कद्र करे उसका संग्रहण करें और अनावश्यक रूप से उसे बर्बाद नहीं करें।
यह विचार विभिन्न वक्ताओं के है जो उन्होंने स्टेट प्रेस क्लब, म.प्र. द्वारा आयोजित ‘जल संकट से जल सुरक्षा’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में व्यक्त किए। यह आयोजन अभिनव कला समाज सभागार में संपन्न हुआ। भारत सरकार के पेयजल मिशन एक निदेशक एवं भूवैज्ञानिक सुधीन्द्र मोहन शर्मा ने कहा कि इंदौर शहर की अपनी कोई नदी नहीं है। हम नर्मदा नदी से पानी उधार लेते हैं। इंदौरवासियों के लिए पानी का एकमात्र स्त्रोत भूजल ही है। आज से 75 वर्ष पूर्व शहर में कुएं-बाबड़ी के माध्यम से जल प्रदाय और जल संग्रहण का कार्य होता था। इसके कुछ वर्षों बाद हैण्डपम्प युग आया जिसमे हमें 30 से ७५ फीट गहराई पर पानी मिलने लगा। इसी दौर में कुछ तालाब भी बनायें गए। आज पानी का जल स्तर हजार फीट तक चला गया है जो विस्फोटक स्थिति है। साढ़े छः करोड़ वर्ष पूर्व ज्वालामुखी का लावा ठंडा होने पर जमीन के भीतर चट्टानें बनीं। इन्ही चट्टानों के बीच से हम पानी निकालते हैं। ऐसा कोई पैमाना नहीं है जिसके माध्यम से हम यह पता लगा सकें कि किस जगह पर पानी की मात्र कम है या अधिक।
श्री शर्मा ने कहा कि इजराइल जैसे देश से इंदौर में ढाई गुना ज्यादा बारिश हुई है। हालात उतने बुरे भी नहीं है, लेकिन हमें दूरदर्शिता रखते हुए 2027 की नहीं बल्कि 2057 की तयारी करना होगी। हमें भूजल स्तर का नक्शा तैयार करना चाहिए ताकि प्रबंधन में सहायता मिल सके। प्रशासन ने शहर में 15 स्थानों पर भूजल स्तर मापने के लिए पीजो मीटर लगाये हैं, उसकी भी सतत मोनिटरिंग होना चाहिए। इसी तरह फ्लो मीटर भी लगाना जरूरी है ताकि यह भी मालूम रहे कि जमीन में कितना पानी है और कितना हम निकाल चुके हैं। उन्होंने बताया कि केन्द्रीय भूजल बोर्ड की एक रिपोर्ट में यह इंगित किया गया है कि हर कहीं वाटर रिचार्ज सिस्टम लगाने से वर्षा का जल जमीन में नहीं उतरेगा। इंदौर में केवल 8 प्रतिशत स्थान ऐसे हैं जहाँ बेहतर वाटर रिचार्ज की सम्भावना है। उन्होंने कहा कि नगर निगम इंदौर जल नीति बनाने जा रहा है इसमें शहर के नागरिक अपने सुझाव दे सकते हैं।
एसजीएसआईटीएस के सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. संदीप नरुलकर ने कहा कि इंदौर में नर्मदा का पानी असमान वितरण व्यवस्था का शिकार है। रिकॉर्ड के मुताबिक़ इंदौर की चौपन प्रतिशत जनसँख्या तक नर्मदा का पानी और शेष जगह बोरिंग या टैकरों के माध्यम से पानी पहुँचता है। एक दिन छोड़कर नर्मदा का पानी रहवासियों को मिलता है उसके आंकड़ों में भी भ्रम है। निगम प्रशासन का दावा है कि नर्मदा परियोजना के माध्यम से रोजाना 360 मिलियन लीटर पानी इंदौर आता है और बोरिंग के माध्यम से करीब 75 मिलियन लीटर पानी लिया जाता है, लेकिन हकीकत में जल वितरण सिर्फ 243 मिलियन लीटर ही होता है। यह समझ से परे है कि आखिर बड़ी मात्र में पानी जाता कहाँ है? उन्होंने इस बात पर चिंता जाहिर की कि विश्व की सबसे महंगी बिजली खर्च करके नर्मदा से इंदौर तक पानी लाने वाली जल वितरण व्यवस्था की कदर शहर की जनता नहीं करती है।
डॉ. नरुलकर ने कहा कि आगामी वर्ष में जनवरी और फ़रवरी माह तो जैसे-तैसे बीत जाएंगे लेकिन असली अग्नि परीक्षा मार्च माह में होगी। हमे सबसे पहले वाटर लीकेज और वेस्टेज पर ध्यान देना चाहिए। निजी हाईड्रेंट वाटर टैंकर सर्विस, कार वाश सेंटर आदि को लेकर भी कोई स्पष्ट नीति बनना चाहिए।
पर्यावरणविद डॉ. दिलीप बाघेला ने कहा कि इंदौर जिले में होने वाली औसत बरसात 35 इंच पानी को हम सुनियोजित तरीके से बचा लेवें तो करीब 16 माह हम आसानी से गुजार सकते हैं। लेकिन अनियोजित तरीकों का दंड सारा शहर भुगत रहा है। कम वर्षा से शहरीय इलाके तो ठीक ग्रामीण इलाकों में हालात और भी बुरे हैं। फसलों की सिंचाई के लिए तो टैंकर भी नहीं पहुँच सकते। ऐसे में बड़ी संख्या में फसलें खराब हो रही हैं। डॉ. वाघेला ने कहा कि पर्यावरण असंतुलन की वजह से लगातार नदियों के जल स्तर में भी कमी आ रही है। पहले पुनासा, ओंकरेषर, यशवंत सागर डेम में कई मर्तबा पानी का ओवरफ्लो होता था लेकिन अब यह इतिहास की बात होती जा रही है। उन्होंने कहा कि तीस-चालीस प्रितशत जंगल कट चुके हैं। ऐसे में अच्छी बरसात की उम्मीद करना बेईमानी है। उन्होंने चेताया कि इस मर्तबा ठण्ड भी असरदायक नहीं रहने वाली। नेपाल जैसी त्रासदी दुनिया के कई देशों में आएगी। उन्होंने इंदौरवासियों का आव्हान किया कि वे पेड़ बचायेंगे तभी हरियाली कायम रहेगी। और तभी बारिश की सम्भावना बनेगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह हम तिजोरी में पैसा रखते हैं उसी शिद्दत से पानी का ख्याल रखना पड़ेगा। प्रति व्यक्ति रोजाना 10 लीटर पानी बचाने का संकल्प लेवें।
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर की हिंदी एसोसिएट प्रो. डॉ. उपासना गुप्ता ने कहा कि यदि हम घरेलु उपयोग में खर्च होने वाले पानी की बचत करें तो बड़ी मात्रा में पानी को बचा सकते हैं। एक ही पानी का बार-बार उपयोग करने से पानी की बचत की जा सकती है। जैसे अनुउपयोगी पानी को पेड़-पौधों में दें। घरेलु बिजली का उपयोग कम करें।
इस परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए स्टेट प्रेस क्लब, म.प्र. के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने कहा कि जल संकट से निपटने के लिए हमें अभी से योजनाबद्ध तरीके से तैयारियां करनी होगी। इसके लिए एक ठोस नीति बनाना होगी क्योंकि समय बहुत कम है। जल एक तो कल है और जल ही जीवन है। जल केवल मनुष्य की नहीं बल्कि मूक पशुओं और पेड़-पौधे सभी के लिए जरूरी है। इस पर अभी से काम करना होगा। कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने कहा कि यदि हमने जल के कुप्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाला समय बड़ा तकलीफ देय होगा। इसके लिए हमे अभी से तैयारी करना होगी।
प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत परिचर्चा संयोजक राजू घोलप, पंकज क्षीरसागर, प्रवीण जोशी, विजय खंडेलवाल, सुनीता श्रीवास्तव, डॉ. मनीष दवे, नीलेश कांठेड ने किया। कार्यक्रम का संचालन उमेश पारेख ने किया। आभार सुनील जैन ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
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