कचौड़ी-समोसे से निकली विरोध की आवाज, जेन-जी के नारों ने बदला प्रदर्शन का अंदाज*
“एक कचौड़ी, दो समोसा… इस वीसी का क्या भरोसा” और “एक जीरा, दो अजवाइन… मर्द जात दो रिजाइन” जैसे नारे अब छात्राओं के प्रदर्शनों में सुनाई दे रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर, पंजाब की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी से लेकर अलीगढ़ एएमयू तक छात्राओं के विरोध प्रदर्शनों में नारेबाजी के अंदाज में बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक नारों और भाषणों के साथ अब मीम, तुकबंदी, व्यंग्य और रोजमर्रा के खान-पान से जुड़े शब्दों का इस्तेमाल भी विरोध के लिए किया जा रहा है। छात्राओं का कहना है कि इन नारों के जरिए महिला सुरक्षा, स्वतंत्रता, समानता और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसले खुद लेने के अधिकार जैसे मुद्दों को सहज और यादगार तरीके से सामने रखा जा रहा है। एएमयू की बीए ऑनर्स की छात्रा सुमैया और इब्रा नूर के अनुसार, महिलाओं को लंबे समय तक घर और किचन तक सीमित किए जाने की सोच रही है। अब उसी किचन से जुड़े शब्दों और रेसिपी को विरोध की भाषा बनाया जा रहा है। छात्रा महवीश ने कहा कि इन नारों का मकसद सभी पुरुषों को निशाना बनाना नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रति कुछ व्यवहार और सोच पर सवाल उठाना है। एएमयू समाजशास्त्र विभाग के चेयरमैन प्रो. मोहम्मद अकरम के अनुसार, महिलाओं की सार्वजनिक स्थानों और सोशल मीडिया पर बढ़ती भागीदारी का असर विरोध की भाषा पर भी दिखाई दे रहा है। उनके मुताबिक सुरक्षा, स्वतंत्रता और समानता जैसे मुद्दों पर महिलाओं की सार्वजनिक अभिव्यक्ति बढ़ना बदलते सार्वजनिक क्षेत्र का हिस्सा है।






