जेन जी की नियत पर शक नहीं कर सकते
भाषा को सरल करने की जरूरत : अबरार अहमद काशिफ़

इंदौर। जेन जी से संवाद जरूरी है। डॉ. राहत इंदौरी मेरे रूहानी उस्ताद हैं। अब मैं कोशिश कोशिश करूंगा की एक नज़्म ऐसी लिखूं जिसमें इंसान खुदा से अपनी बात कहे।
यह सब कहा मशहूर शायर अबरार अहमद काशिफ़ ने स्टेट प्रेस क्लब मध्य प्रदेश के प्रोग्राम ‘रूबरू’ में। शाजापुर के नातिया मुशायरा में शिरकत करने आए अबरार अहमद काशिफ़ ने एक घंटे तक पत्रकारों के हर सवाल का जवाब बेबाकी से दिया।
अबरार काशिफ़ ने कहा कि अब जेन ज़ी और जेन अल्फा जागृत हो चुके हैं और आपको उनकी बात समझना होगी। हमें कई मर्तबा लगता है इनकी बातें गलत है लेकिन जब सुनते हैं तो लगता है यह सही है। उनकी नियत पर शक नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मैं शायर और लेखक हूं जो सही दिखता और लगता है वो लिखता हूं।
अबरार काशिफ़ ने कहा कि हर दौर में पीढ़ी बदलाव के साथ चीज बदलती है। हम अभी बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। वर्तमान पीढ़ी कम समय में ज्यादा कंटेंट चाहती है। कविता और शायरी के संदर्भ में भी यही बात लागू है।
एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि भाषाओं को सरल करने की आवश्यकता है। मुश्किल शब्दों को सरल करने का जिम्मा शब्दकोश बनाने वालों पर है। उन्होंने कहा कि उर्दू को लेकर अनावश्यक बातें फैलाई जाती है जबकि उर्दू दिलों में बसने वाली भाषा है। यह महोब्बत की भाषा है। वर्तमान दौर में मुशायरा में उर्दू शायरी करने वालों में गैर मुसलमानों की बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है। कोई भी भाषा हो वह हमेशा एक दूसरे को जोड़ने का ही काम करती है। उन्होंने कहा कि समय-समय पर कतिपय लोग भाषा को लेकर सियासी विवाद पैदा करते रहते हैं लेकिन उसका हासिल कुछ नहीं है। महाराष्ट्र के अमरावती के शायर ने कहा कि महाराष्ट्र में मराठी भाषा को प्रचलन में लाने वाला आदेश कुछ गलत नहीं है।
प्रसिद्ध शायर काशिफ़ ने कहा कि हर क्षेत्र की तरह साहित्य में गिरावट आ रही है। मंच का स्तर भले ही गिर रहा है लेकिन सुनने वाले अच्छे शायर- कवि को खोज कर सुन ही लेते हैं।
उन्होंने डॉ.राहत इंदौरी को याद करते हुए कहा कि इंदौर शायरी और साहित्य की धरोहर नगरी है। इंदौर ने कई मूर्धन्य शायर लेखक और कलाकार दिए हैं। उन्होंने बताया कि डॉ. राहत इंदौरी उनके रूहानी उस्ताद हैं। जब वह मुशायरा के सितारे थे तब उन्होंने उन्हें कई बार मौके दिए और तराशा भी। उन्होंने डॉ. राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा, मंजर भोपाली, बशीर बद्र जैसे कई शायरों का जिक्र करते हुए कहा कि एक दौर में इन्होंने देश भर में मुशायरों को स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत की। हमारी पीढ़ी तो अब फसल काट रही है।
अबरार अहमद काशिफ़ ने बताया कि बरसों पूर्व उन्होंने ‘खूदा का सवाल’ शीर्षक से नजम लिखी थी। इसे अल्लामा इकबाल के शिकवा और जवाबे शिकवा से जोड़ा गया लेकिन इसमें ऐसा कुछ नहीं था। अपनी नज़्म में उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि खुदा सर्वोच्च शक्ति है और बंदे को उनके सामने नतमस्तक रहना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से इंसान खुद को ताकतवर समझने लगा है। उन्होंने बताया कि अब वह इस नज़्म से आगे की बात लिखने की कोशिश करेंगे।
प्रारंभ में शायर काशिफ़ का स्वागत दीपक असीम, प्रवीण खारीवाल, आकाश चौकसे, समीर खान, महबूब कुरैशी, मेहदी मंसूर खान ने किया। उन्हें स्टेट प्रेस क्लब म.प्र. का स्मृति चिन्ह एवं साहित्य भी भेंट किया।
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