*शक्कर महंगी हुई तो क्या… मिठाई का स्वाद तो बदल गया!*
*अक्षय जैन*
रक्षाबंधन है… बहन भाई की कलाई पर राखी बांधेगी, भाई बहन को उपहार देगा और फिर बारी आएगी मुँह मीठा कराने की।
लेकिन इस बार मिठाई की दुकान पर खड़े होकर लगा कि महंगाई ने सिर्फ शक्कर का भाव नहीं बढ़ाया, मिठाई खाने की पसंद भी बदल दी है।
मावे में मिलावट की खबरों ने बाजार में मावे की शुद्धता को लेकर ऐसी अमिट छाप छोड़ी है कि ग्राहक अब मावे की मिठाइयों को देखकर भी दो बार सोच रहा है। नतीजा सामने है काजू कतली करीब 1200 रुपए किलो, फिर भी ग्राहक उसे खरीदने को तैयार है।
मजेदार बात तो यह कि आज एक अच्छे मिठाई निर्माता ने काजू कतली के आगे ही लिख दिया “उपलब्ध नहीं।”
यानी जिस मिठाई का भाव सुनकर कभी ग्राहक कहता था, “भाई साहब, कुछ सस्ती वाली दिखाइए…” आज उसी के लिए ग्राहक पूछ रहा है “काजू कतली है?”
*और दुकानदार का जवाब—“नहीं है!”*
दौर भी कमाल का है। यहां कभी-कभी पूर्वानुमान फेल हो जाता है और ग्राहक का मूड बाजार की पूरी गणित बदल देता है।
बगल में बेसन के लड्डू रखे हैं। बेसन की चक्की भी है। शुद्धता पर सवाल नहीं, स्वाद पर भी कोई शिकायत नहीं… मगर मांग ऐसी कि जैसे ग्राहक और बेसन की मिठाई के बीच कोई पुरानी नाराजगी चल रही हो।
*बेसन लड्डू—शुद्ध, पारंपरिक और लगभग मांग से बाहर।*
वहीं दूसरी तरफ ड्राय फ्रूट की मिठाइयां बाजार में अपनी जगह बना रही हैं। शायद ग्राहक अब मिठाई में भी वही चीज चाहता है जिसके नाम के साथ “शुद्धता पर भरोसा” थोड़ा आसान हो।
शक्कर महंगी हुई तो दुकानदार ने भाव बढ़ाया, लेकिन ग्राहक ने उससे भी बड़ा बदलाव कर दिया उसने मिठाई चुनने का अपना पैमाना बदल दिया।
आज रक्षाबंधन पर बहन के हाथ की राखी तो वही है, भाई का स्नेह भी वही है, मुँह मीठा कराने की परंपरा भी वही है…
*बस मिठाई की थाली कह रही है*
“जमाना बदल गया है भाई साहब… अब मिठाई में भी भरोसा पहले और स्वाद बाद में देखा जाता है!”
और बाजार को देखकर लगता है कि आने वाले समय में मिठाई की दुकान पर शायद सबसे बड़ा बोर्ड यह नहीं होगा कि “आज की ताजा मिठाई”, बल्कि यह होगा
“मावे की चिंता छोड़िए, भरोसे की मिठाई लीजिए!”
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