बागड़ ही खेत खा रही हो तो क्या ही कहें?

*बागड़ ही खेत खा रही हो तो क्या ही कहें?*

*राजबाड़ा में अतिक्रमण हटाने वाली व्यवस्था पर ही उठ रहे सवाल, फुटपाथ कब्जों का बढ़ता दायरा बना चर्चा का विषय*

इंदौर। शहर के सबसे व्यस्त और चर्चित स्मार्ट सिटी हेरिटेज क्षेत्र राजबाड़ा में अतिक्रमण और सड़क-फुटपाथ कब्जों को लेकर नगर निगम की जीरो टॉलरेंस नीति भले ही कागजों पर सख्त दिखाई देती हो, लेकिन जमीन पर हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब व्यवस्था की निगरानी और अतिक्रमण हटाने वाला तंत्र ही उसी व्यवस्था का भागीदार नजर आए तो इसे क्या कहा जाए?

रविवार को राजबाड़ा क्षेत्र में फुटपाथों पर लगी अस्थायी दुकानों और सड़क तक फैले कारोबार का जायजा लेने की कोशिश की गई। किस दिशा में कितने फुटपाथ कब्जे हैं और किस तरह इन कब्जों को संरक्षण मिल रहा है, इसका मोटा-मोटा हिसाब लगाने पर ही तस्वीर चौंकाने वाली नजर आई।

स्थानीय स्तर पर चर्चा यह है कि फुटपाथ और सड़क की सार्वजनिक जगह पर कब्जे का यह खेल केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक हितों से जुड़ा मामला हो सकता है। यदि इन कब्जों के कथित संरक्षण और उनसे जुड़े आर्थिक लेन-देन का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए तो अकेले राजबाड़ा क्षेत्र से ही लाखों रुपये के कारोबार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि इस तरह के किसी भी आर्थिक लेन-देन की पुष्टि के लिए स्वतंत्र जांच जरूरी है।

विडंबना यह है कि एक तरफ नगर निगम करदाता दुकानदारों और स्थायी व्यापारियों को अतिक्रमण के नाम पर कार्रवाई का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ फुटपाथ और सड़क पर कारोबार करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती दिखाई देती है। इससे उन व्यापारियों में भी असंतोष है जो नियमित रूप से कर, बिजली, किराया और अन्य व्यावसायिक खर्च वहन कर अपना कारोबार संचालित करते हैं।

राजबाड़ा केवल बाजार नहीं, बल्कि इंदौर की ऐतिहासिक पहचान और हेरिटेज क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां बढ़ते अनियंत्रित फुटपाथ कब्जे न केवल यातायात और पैदल चलने वालों की परेशानी बढ़ा रहे हैं, बल्कि स्मार्ट सिटी और हेरिटेज क्षेत्र की पूरी अवधारणा पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं।

अब जरूरत केवल रीमूव्हल की कार्रवाई दिखाने की नहीं, बल्कि रीमूव्हल व्यवस्था की जवाबदेही तय करने की है। रविवार को सामने आई स्थिति के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है अगर अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी जिस तंत्र की है, उसी पर संरक्षण के आरोप लगने लगें तो फिर शहर में जीरो टॉलरेंस आखिर लागू कौन करेगा?

राजबाड़ा के फुटपाथों का निष्पक्ष सर्वे, कब्जे वाली जगह का वास्तविक आकलन, कार्रवाई का रिकॉर्ड और लंबे समय से मौजूद अतिक्रमणों की जांच हो तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है। वरना सवाल यही रहेगा “बागड़ ही खेत खा रही हो तो फिर खेत की रखवाली कौन करेगा?”

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