*केशर वाटिका का चातुर्मास आपसी विवादों के घेरे में*
*26 वर्षों बाद इंदौर को मिला गच्छाधिपति का चातुर्मास, पर्यूषण से पहले ही संघ की खींचतान चर्चा में*
इंदौर। त्रिस्तुतिक जैन समाज के गच्छाधिपति का चातुर्मास 26 वर्षों के अंतराल के बाद इंदौर को मिला है। केशर वाटिका में चल रहे इस चातुर्मास को लेकर समाज में उत्साह था, लेकिन संघ की आपसी खींचतान, क्षेत्रीय मानसिकता और ओसवाल-पोरवाल जैसे सामाजिक विभाजन की चर्चाओं ने माहौल को पर्यूषण पर्व से पहले ही विवादों के घेरे में ला दिया है।
शनिवार को स्वामी वात्सल्य के दौरान संघ अध्यक्ष के पुत्र मनीष और समाज के एक लोकप्रिय गुरु भक्त के बीच कथित रूप से विवाद और तीखी भाषा के इस्तेमाल की घटना चर्चा में रही। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मामला इतना बढ़ा कि उपस्थित श्रावकों में भी असहज स्थिति बनी। घटना की चर्चा अब केवल त्रिस्तुतिक समाज तक सीमित नहीं रहकर व्यापक जैन समाज में होने लगी है।
समाज में चल रही चर्चाओं के अनुसार चातुर्मास प्रारंभ होने के बाद से ही भोजन व्यवस्था और प्रवेश व्यवस्था को लेकर मनीष के व्यवहार पर कुछ श्रावकों ने आपत्ति जताई है। आरोप है कि पास अथवा व्यवस्था संबंधी कारणों से कुछ श्रावकों के साथ कथित रूप से अप्रिय शब्दों का इस्तेमाल किया गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
समाज के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि चातुर्मास जैसे धार्मिक आयोजन में पद, परिवार या प्रभाव से अधिक महत्वपूर्ण विनय, मर्यादा और गुरु के प्रति श्रद्धा होती है। किसी भी विवाद को सार्वजनिक टकराव का रूप देने के बजाय आपसी संवाद और वरिष्ठों की मध्यस्थता से सुलझाया जाना चाहिए।
गच्छाधिपति के चातुर्मास का इंदौर को 26 वर्ष बाद अवसर मिलना समाज के लिए गौरव की बात माना जा रहा है। ऐसे में पर्यूषण पर्व के पहले सामने आ रहे विवादों ने समाज के प्रबुद्ध वर्ग को चिंतित किया है। अब निगाह इस बात पर है कि संघ और वरिष्ठजन घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा कर आपसी मतभेदों को समाप्त करते हैं या चातुर्मास की धार्मिक गरिमा पर संगठनात्मक विवाद हावी होते हैं।
धार्मिक आयोजन की सफलता भीड़, प्रतिष्ठा और पद से नहीं, बल्कि विनय, अनुशासन और सामूहिक सौहार्द से तय होती है।
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