जब जीवनशैली बड़ी हुई, तो परिवार का सुकून छोटा क्यों हो गया?*

*जब जीवनशैली बड़ी हुई, तो परिवार का सुकून छोटा क्यों हो गया?*
*आधुनिकता की दौड़, बदलती वैवाहिक कसौटियां और रिश्तों में घटती सहनशीलता*

✒️ *अक्षय जैन*

समाज बदल रहा है। जीवन जीने के तौर-तरीके बदल रहे हैं, रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं और परिवार की प्राथमिकताएं भी बदल रही हैं। आधुनिकता ने हमें अनेक सुविधाएं दी हैं, महिलाओं को शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता मिली है, युवाओं को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिली है यह सब सामाजिक प्रगति के महत्वपूर्ण पक्ष हैं।
लेकिन इस प्रगति के बीच एक सवाल लगातार सामने खड़ा है क्या आधुनिक जीवनशैली की चमक के पीछे हमारा पारिवारिक सुकून कहीं खोता जा रहा है?

महंगे रेस्तरां, होटल, पब, नाइट लाइफ, विदेशी यात्राएं, ब्रांडेड जीवनशैली और सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली चमक ने सफलता की एक नई तस्वीर बना दी है। समस्या आधुनिक सुविधाओं में नहीं है; समस्या तब है जब सुविधा को संस्कार और दिखावे को चरित्र से अधिक महत्व मिलने लगे।

*जीवनसाथी का चयन—चरित्र से लाइफस्टाइल तक*

एक समय था जब विवाह के लिए लड़के की आर्थिक स्थिति के साथ उसके चाल-चरित्र, स्वभाव, संस्कार, धर्मनिष्ठा, परिवार की प्रतिष्ठा, कारोबार में ईमानदारी और व्यवहार-कुशलता को गंभीरता से परखा जाता था।
परिवार यह जानने की कोशिश करता था कि लड़का संकट में कैसा व्यवहार करता है? बड़ों का सम्मान करता है या नहीं? कारोबार में ईमानदार है या नहीं? परिवार को साथ लेकर चल सकता है या नहीं?
आज तस्वीर काफी हद तक बदली है।
कई मामलों में आर्थिक समृद्धि और आधुनिक जीवनशैली रिश्ते की प्राथमिक कसौटी बनती दिखाई देती है। बड़ा कारोबार, महंगी गाड़ी, आलीशान घर, विदेशी यात्राएं, होटल-पब संस्कृति और नाइट लाइफ को आधुनिक व्यक्तित्व का प्रतीक मान लिया जाता है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आधुनिक जीवनशैली अपने आप में कोई अपराध नहीं है। कोई व्यक्ति होटल जाए, यात्रा करे या अपनी पसंद की जीवनशैली अपनाए, इससे उसका चरित्र स्वतः अच्छा या बुरा निर्धारित नहीं होता। असली प्रश्न यह है कि क्या इन बाहरी चीजों के साथ जिम्मेदारी, संयम और पारिवारिक संवेदनशीलता भी मौजूद है?
*पाश्चात्य जीवनशैली का अनुकरण या अपनी पहचान का विस्मरण?*

दुनिया से सीखना बुरा नहीं है। पश्चिमी समाज की अनेक अच्छी बातें समय की पाबंदी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पेशेवर अनुशासन, लैंगिक समानता और व्यक्तिगत अधिकारों का सम्मान हमारे लिए भी प्रेरणादायक हैं।

लेकिन हमने कई बार अच्छी बातों को अपनाने के बजाय दिखावटी जीवनशैली का अनुकरण अधिक तेजी से किया है।
पब और नाइट लाइफ को आधुनिकता, शराब को सामाजिक प्रतिष्ठा और लगातार महंगे मनोरंजन को जीवन की सफलता का प्रतीक मान लेना किस दिशा की ओर ले जा रहा है, इस पर परिवारों को चिंतन करना होगा।
हमने घर में साथ बैठकर भोजन करने का समय खो दिया, लेकिन बाहर घंटों बैठने का समय निकाल लिया। परिवार के साथ बातचीत कम हुई, लेकिन सोशल मीडिया पर आभासी रिश्ते बढ़ गए। बुजुर्गों के अनुभव सुनने का धैर्य कम हुआ, लेकिन इंटरनेट पर अनजान लोगों की राय सुनने का समय बढ़ गया।
यही वह विरोधाभास है जिस पर समाज को रुककर विचार करना चाहिए।

*आत्मनिर्भरता जरूरी है, स्वच्छंदता नहीं*

महिलाओं का आत्मनिर्भर होना समाज की बड़ी उपलब्धि है। शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिला परिवार के लिए शक्ति है, बोझ नहीं।

लेकिन आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है। वास्तविक आत्मनिर्भरता में निर्णय लेने की क्षमता के साथ निर्णयों की जिम्मेदारी स्वीकार करना भी शामिल है।

स्वतंत्रता का अर्थ अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन सामने वाले की बात सुनने की क्षमता भी स्वतंत्र व्यक्तित्व का हिस्सा है।
विवाह में पत्नी की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही पति का सम्मान भी। अधिकार दोनों के हैं तो जिम्मेदारियां भी दोनों की हैं।
स्वतंत्रता जब संवेदनशीलता से जुड़ती है तो व्यक्तित्व बनाती है; लेकिन जब जिम्मेदारी से कट जाती है तो स्वच्छंदता का रूप ले सकती है।

*लेकिन सवाल केवल लड़कियों से नहीं लड़कों से भी है*
समाज में वैवाहिक संबंधों के बिगड़ने का पूरा दोष लड़कियों पर डाल देना भी गलत होगा।
आज अनेक युवकों में भी दिखावा, अहंकार, गैर-जिम्मेदारी, नशे की आदत, परिवार से दूरी, पत्नी के करियर और विचारों के प्रति असम्मान जैसी समस्याएं दिखाई देती हैं।
कुछ पुरुष आज भी चाहते हैं कि पत्नी आधुनिक भी हो, शिक्षित भी हो, कमाए भी लेकिन निर्णय लेने की स्वतंत्रता केवल पति की हो। यह दोहरा मापदंड भी विवाह को कमजोर करता है।
इसलिए विवाह को बचाने की जिम्मेदारी केवल लड़की या केवल लड़के की नहीं, दोनों की है

*सहनशीलता कम हुई, टकराव बढ़ा*

पहले के विवाहों में भी समस्याएं होती थीं। मतभेद भी होते थे, आर्थिक संकट भी आते थे और पारिवारिक तनाव भी होता था।
अंतर शायद इतना था कि रिश्ते को बचाने के लिए संवाद और धैर्य का रास्ता अधिक अपनाया जाता था।
आज छोटी-सी बात कई बार आत्मसम्मान का प्रश्न बन जाती है। पति-पत्नी के बीच संवाद बंद, परिवार से दूरी और फिर सोशल मीडिया या मित्रों की सलाह और देखते ही देखते मामूली विवाद बड़ा संघर्ष बन जाता है।

हर विवाह को किसी भी कीमत पर बचाना जरूरी नहीं। हिंसा, अत्याचार, शोषण या गंभीर असुरक्षा की स्थिति में अलग होना उचित हो सकता है। लेकिन सामान्य मतभेदों को भी असहनीय मान लेना रिश्तों की कमजोर होती सहनशीलता का संकेत है।

*सोशल मीडिया ने रिश्तों के लिए बना दी है नकली दुनिया*

आज सोशल मीडिया पर हर किसी की जिंदगी सुंदर दिखाई देती है।

किसी की विदेश यात्रा, किसी का महंगा होटल, किसी का रोमांटिक डिनर, किसी का परफेक्ट कपल फोटोशूट लेकिन कैमरे के पीछे का तनाव कोई नहीं दिखाता।
युवा जब अपनी वास्तविक जिंदगी की तुलना दूसरों की चुनी हुई तस्वीरों से करने लगते हैं तो असंतोष जन्म लेता है।
दिखाई देने वाली खुशी और वास्तविक खुशी में अंतर समझना आज की पीढ़ी के लिए बेहद जरूरी है।

*परिवार में लोग साथ हैं, लेकिन सुकून साथ नहीं*

आज कई घरों में आर्थिक सुविधा पहले से अधिक है, लेकिन मानसिक शांति कम दिखाई देती है।

एक ही घर में रहने वाले परिवार के सदस्य अलग-अलग कमरों में अलग-अलग स्क्रीन पर व्यस्त हैं। भोजन की मेज पर बातचीत की जगह मोबाइल है। बच्चों के पास माता-पिता के साथ समय कम है और माता-पिता के पास बच्चों को सुनने का धैर्य कम होता जा रहा है।

*घर बड़ा हो गया, लेकिन परिवार का संवाद छोटा हो गया।*

सुविधाएं बढ़ गईं, लेकिन साथ बैठने का समय घट गया।
यही वह बिंदु है जहां आधुनिक समाज को आत्ममंथन की आवश्यकता है।*

विवाह कोई लाइफस्टाइल प्रोजेक्ट नहीं
विवाह को यदि केवल आर्थिक सुविधा, आकर्षण और आधुनिक जीवनशैली के आधार पर देखा जाएगा तो कठिन समय आते ही रिश्ते की वास्तविकता सामने आ जाएगी।

जीवनसाथी वह नहीं जो केवल अच्छे दिनों में साथ दिखाई दे।
जीवनसाथी वह है जो बीमारी में दवा दे, कारोबार में नुकसान हो तो हिम्मत दे, परिवार में संकट आए तो कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो और असहमति के बावजूद रिश्ते का सम्मान बनाए रखे।

विवाह का असली परीक्षण हनीमून में नहीं, कठिन समय में होता है।
हमें आधुनिकता चाहिए, लेकिन जड़ों से कटकर नहीं
समाज को पीछे लौटने की जरूरत नहीं है।

हमें आधुनिक शिक्षा चाहिए, महिलाओं की आत्मनिर्भरता चाहिए, युवाओं की स्वतंत्र सोच चाहिए, तकनीक चाहिए और दुनिया के अच्छे विचारों को अपनाने की क्षमता भी चाहिए।
लेकिन इसके साथ हमें अपने परिवार की वह ताकत भी बचानी होगी जिसमें सम्मान, विश्वास, संयम, सहनशीलता, संवाद और परस्पर जिम्मेदारी शामिल है।
आधुनिकता का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी हर पुरानी परंपरा को पिछड़ा मान लें।
और संस्कारों का अर्थ यह भी नहीं कि हम हर पुरानी व्यवस्था को सही मान लें।
सही रास्ता दोनों के श्रेष्ठ तत्वों को साथ लेकर चलने में है।

*अब परिवारों को फिर से ‘सुकून’ की परिभाषा तय करनी होगी*

आज हमें अपने बच्चों से यह पूछना होगा कि जीवनसाथी चुनते समय तुम्हें केवल यह देखना है कि वह कितना कमाता है और कैसी जिंदगी जीता है, या यह भी देखना है कि वह इंसान कैसा है?

*क्या वह सम्मान करना जानता है?*

*क्या वह अपनी गलती स्वीकार कर सकता है?*

*क्या वह कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखता है?*

*क्या वह परिवार और रिश्तों की अहमियत समझता है?*

क्या दोनों एक-दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए जिम्मेदारियों को निभा सकते हैं?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक हैं, तो विवाह की नींव मजबूत हो सकती है।

क्योंकि अंततः परिवार महंगे फर्नीचर, आलीशान घर और विदेशी यात्राओं से सुखी नहीं होता।

परिवार सुखी होता है विश्वास से।
रिश्ते टिकते हैं सम्मान से।
विवाह चलता है संवाद से।
और घर में सुकून आता है एक-दूसरे को समझने से।

आज जरूरत यह तय करने की है कि हमें दिखने में आधुनिक परिवार चाहिए या भीतर से सुखी परिवार।

क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि जीवनशैली की दौड़ में हम सब कुछ हासिल कर लें और अंत में यह महसूस करें कि जिस सुकून के लिए इतना सब कमाया, वही सुकून घर की चौखट से बाहर निकल चुका है।

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