*चातुर्मास : तप का पर्व या प्रचार का महोत्सव?*
✒️*अक्षय जैन(नाकोड़ा)*
जैन समाज में चातुर्मास का अर्थ कभी आत्मचिंतन, तप, स्वाध्याय, संयम और साधना का पर्याय हुआ करता था। चार महीने तक साधु-साध्वियों का एक स्थान पर विराजमान रहना, धर्म की गूंज और आत्मकल्याण का अवसर माना जाता था। लेकिन समय के साथ लगता है कि चातुर्मास भी “इवेंट मैनेजमेंट” के नए युग में प्रवेश कर चुका है।
कहीं कलश की बोली करोड़ों की चर्चा बन रही है, तो कहीं कमेटियों में किसे शामिल किया जाए और किसे बाहर रखा जाए, यही सबसे बड़ा धार्मिक प्रश्न बन गया है। किसी मंदिर ट्रस्ट में विवादित व्यक्ति को ट्रस्टी बनाने का प्रस्ताव सोशल मीडिया पर युद्ध छेड़ देता है, तो कहीं स्वागत मंच पर पहली पंक्ति में बैठने का संघर्ष धर्म से भी बड़ा विषय बन जाता है।
अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि चातुर्मास की सफलता का पैमाना तपस्या नहीं, बल्कि फेसबुक की रीच, इंस्टाग्राम की रील, यूट्यूब के व्यूज़ और व्हाट्सऐप की फॉरवर्ड संख्या हो गई है। साधु-साध्वियों के प्रवचनों से अधिक चर्चा उनके नाम से चल रहे सोशल मीडिया पेजों की होती है। लाइक, शेयर और फॉलोअर्स की प्रतियोगिता में धर्म भी कहीं “डिजिटल मार्केटिंग” का विषय बनता दिखाई देता है।
कुछ स्थानों पर तो प्रोफेशनल एजेंसियां धर्म प्रचार नहीं, बल्कि “ब्रांड प्रमोशन” का दायित्व निभाती नजर आती हैं। प्रतिदिन नई पोस्ट, नए पोस्टर, नई रील, नया वीडियो… मानो संदेश यह हो कि “जो सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर गया, वही सबसे सफल चातुर्मास।”
भगवान महावीर ने मौन, विनय, अपरिग्रह और अहंकार त्याग का संदेश दिया था। आज यदि वे यह दृश्य देखते, तो शायद मुस्कुराकर पूछते “तप अधिक हो रहा है या टैग?”
संयम बढ़ रहा है या सेल्फी?
स्वाध्याय हो रहा है या सोशल मीडिया की रणनीति?
विडंबना यह है कि जिन विषयों पर समाज को आत्ममंथन करना चाहिए, वहां बहस इस बात पर होती है कि किसकी फोटो बड़ी छपी, किसकी पोस्ट ज्यादा वायरल हुई और किसका नाम मंच पर पहले लिया गया।
धर्म की प्रतिष्ठा प्रचार से नहीं, आचरण से बढ़ती है। साधु-साध्वियों की महिमा पोस्टरों से नहीं, उनके संयम और साधना से स्थापित होती है। यदि चातुर्मास का केंद्र आत्मा के बजाय प्रचार और प्रतिष्ठा बन जाएगा, तो कहीं ऐसा न हो कि धर्म का मूल संदेश शोर में दब जाए।
समय अभी भी है। चातुर्मास को प्रतियोगिता नहीं, आत्मपरिवर्तन का पर्व बनने दें। प्रचार हो, पर मर्यादा के साथ; आयोजन हों, पर अहंकार के बिना; और सोशल मीडिया साधन रहे, साध्य नहीं।
अन्यथा आने वाली पीढ़ियां शायद यही पूछेंगी “यह चातुर्मास था या चार महीने का धार्मिक प्रचार अभियान?”






