*अब केवल सम्मान नहीं, धर्म रक्षा का पुरुषार्थ चाहिए*
*✒️ अक्षय जैन*
श्रमण संस्कृति केवल प्रवचन सुनने, जयकारे लगाने और आयोजनों की भव्यता दिखाने से सुरक्षित नहीं रहने वाली।
यदि समाज यह मान बैठा है कि दान पट्टिका पर नाम अंकित हो जाना, समाचार पत्रों में फोटो प्रकाशित हो जाना और मंचों पर सम्मानित हो जाना ही धर्म सेवा की अंतिम उपलब्धि है, तो यह आत्ममंथन का विषय है।
आज प्रश्न सीधा है ….
जब पूज्य साधु-साध्वी भगवंत असुरक्षा, दुर्घटनाओं और षड्यंत्रों के बीच विहार कर रहे हैं, तब समाज के प्रभावशाली, संपन्न और पदलोलुप वर्ग की वास्तविक भूमिका क्या है?
समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन्हें पद चाहिए, प्रतिष्ठा चाहिए, उपाधियाँ चाहिए, मंच चाहिए, अभिनंदन चाहिए;
लेकिन जब धर्म रक्षा के लिए समय, श्रम, संगठन और त्याग की आवश्यकता होती है, तब वही लोग पीछे क्यों दिखाई देते हैं?
यह कटु सत्य है कि जैन समाज का एक बड़ा वर्ग धर्म को साधना नहीं, सामाजिक प्रदर्शन बना चुका है।
सैकड़ों समितियाँ…
दर्जनों महासंघ…
अनगिनत सोशल ग्रुप…
भव्य आयोजन…
महंगे होटल…
फोटो सेशन…
राजनीतिक समीकरण…
यदि यही सब जैन समाज की सक्रियता का केंद्र बन गया, तो फिर जैनत्व का मूल स्वरूप कहाँ बचेगा?
इंदौर सहित देश के हर बड़े शहर में सोशल ग्रुपों की भरमार है।
परंतु इन समूहों को स्वयं से पूछना चाहिए क्या उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन, नेटवर्किंग और सामाजिक चमक तक सीमित रह गया है?
आज आवश्यकता “पार्टी संस्कृति” से बाहर निकलकर “पद यात्रा संस्कृति” अपनाने की है।
महंगी बैठकों के बजाय यदि युवा साधु-साध्वियों के साथ 10-10 किलोमीटर पैदल विहार करें, उनकी सुरक्षा व्यवस्था में सहभागी बनें, धर्म मर्यादाओं को समझें और जैनत्व को जीवन का आधार बनाएं । तभी समाज की नई पीढ़ी में वास्तविक संस्कार जागेंगे।
समाज के भामाशाहों को भी दिशा बदलनी होगी।
यदि करोड़ों रुपये केवल भवनों, स्वागत द्वारों और दिखावटी आयोजनों पर खर्च होते रहेंगे, लेकिन साधु-साध्वियों की सुरक्षा, वैयावच्च व्यवस्था और धर्म रक्षा के संगठित तंत्र खड़े नहीं होंगे, तो यह संपन्नता अधूरी मानी जाएगी।
समय की मांग है कि जैन समाज अब “वैयावच्च सेना” जैसी संगठित व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करे
ऐसी व्यवस्था जो साधु-साध्वियों के विहार मार्ग, सुरक्षा, स्वास्थ्य और आवश्यक व्यवस्थाओं में समर्पित भाव से खड़ी रहे।
यह आंदोलन किसी व्यक्ति या संगठन का नहीं,
पूरी श्रमण संस्कृति के अस्तित्व का प्रश्न है।
आज आवश्यकता है
धर्म को फोटोबाजी से मुक्त करने की,
पदलोलुप मानसिकता से ऊपर उठने की,
जैनत्व को जीवन व्यवहार में उतारने की,
और समाज को पुनः त्याग, संयम एवं संरक्षण की दिशा में संगठित करने की।
याद रखिए ।
समाज केवल संपत्ति से शक्तिशाली नहीं बनता,
समाज तब शक्तिशाली बनता है जब उसके भीतर धर्म रक्षा का जीवंत साहस बचा रहता है।
यदि आज भी समाज नहीं जागा, तो आने वाला समय केवल प्रश्न पूछेगा, उत्तर देने का अवसर शायद नहीं देगा।
अब समय आ गया है कि जैन समाज केवल धर्म का उपभोगकर्ता नहीं,
बल्कि भगवान महावीर स्वामी की श्रमण संस्कृति का सजग प्रहरी बने।






