*संवाद से दूरी या सामाजिक विभाजन की रणनीति?*
*नवकारसी विवाद में बढ़ी संप्रदायिक खींचतान की चर्चा*
इंदौर। महावीर जन्म कल्याणक दिवस पर हुए नवकारसी बाधित विवाद को लेकर अब जैन समाज में नई चर्चाओं ने जन्म ले लिया है। समाज के कई न्यासियों एवं वरिष्ठ समाजसेवियों द्वारा समन्वय संवाद और विवाद के शांतिपूर्ण पटाक्षेप के प्रयास किए गए, लेकिन आरोप है कि नेतृत्व एवं उनके समर्थक गैर निर्वाचित पदाधिकारियों ने यह कहते हुए इन प्रयासों को खारिज कर दिया कि “संप्रदाय विशेष की पक्षधरता हो रही है।”
समाजजनों के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई है कि स्थानक और मंदिर परंपरा के विषय को बीच में लाकर प्रस्तावित समन्वय बैठक को निर्णय की भेंट चढ़ा दिया गया। जबकि समन्वय के पक्षधर बताए जा रहे प्रकाश भटेवरा, जिनेश्वर जैन, रितेश कटकानी और विमल तांतेड़ स्वयं स्थानकवासी परंपरा से जुड़े बताए जाते हैं। वहीं नवकारसी आयोजनकर्ता अक्षय जैन भी स्थानकवासी समाज से संबंध रखते हैं।
विशेष चर्चा इस बात को लेकर भी है कि अक्षय जैन नाकोड़ा भैरव के उपासक हैं तथा नाकोड़ा जैन कांफ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। समाजजनों के अनुसार उन्हें नवकारसी आयोजन की प्रेरणा आचार्य डॉ. मुक्ति सागर महाराज से प्राप्त हुई थी। बताया जा रहा है कि यह आयोजन प्रारंभ से ही दोनों संप्रदायों के आचार्यों के समन्वय और धार्मिक सद्भाव के संदेश के साथ शुरू किया गया था।
इसी आधार पर समाज के एक वर्ग का आरोप है कि गैर निर्वाचित पदाधिकारियों द्वारा इस पूरे विषय को सामाजिक और संप्रदायिक बंटवारे की दिशा में मोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जो केवल विवाद को और अधिक बढ़ाने का माध्यम बन रहा है। राजनीतिक शतरंजी दांव के तहत विवाद को सामाजिक विभाजन की ओर ले जाने की चर्चाएं भी अब खुलकर सामने आने लगी हैं।
वहीं दूसरी ओर कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि स्थानकवासी समाज के कुछ प्रभावशाली लोग महासंघ में प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से इस विषय को लगातार तूल दे रहे हैं।
इन तमाम आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच समाज के प्रबुद्धजन लगातार यह प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या संवाद और समन्वय की राह छोड़कर विवाद को संप्रदायिक दृष्टि से देखने से सामाजिक एकता, आपसी विश्वास और धार्मिक सौहार्द को नुकसान नहीं पहुंचेगा?






