*अपशब्दों का नहीं जनता के काम का हिसाब लगाएं !अन्ना दुराई

*अपशब्दों का नहीं जनता के काम का हिसाब लगाएं !*

*-अन्ना दुराई*

लोकतंत्र का यह नियम है कि सत्ता में रहो तो काम करो और विपक्ष में रहो तो संघर्ष। वाकई इसकी खूबसूरती भी इसी में है। दोनों की अपनी अपनी राह है। सत्ता पक्ष को जहां आम जनता के हितों के प्रति सजग रहना चाहिए वहीं विपक्ष को समय समय पर नागरिकों से जुड़ी समस्याओं को लेकर आवाज बुलंद करना चाहिए। सबकुछ कर्म और कर्तव्य पर टिका है लेकिन अब स्थिति बदली हुई सी नजर आती है। मुद्दों की राजनीति मर रही है और ऊलजलूल बोली की मुखरता इसका स्थान लेती जा रही है। पक्ष हो या विपक्ष आजकल आरोप प्रत्यारोप हलके अंदाज में और हलके स्तर पर उतर आए हैं। कोई किसी को कुछ भी बोल जाता है। असंयमित भाषा का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। न बड़ों का मान न छोटों का सम्मान, जिसे जहां मौका मिलता है, तु तड़ाक की भाषा का उपयोग करने लगता है। पक्ष हो या विपक्ष, सभी एक दूसरे को दी जाने वाली गालियों की गणना में ही लगे रहते हैं। जनता के कामों की बजाय अपशब्दों का हिसाब किताब लगानें में ये समय बरबाद कर देते हैं। राजनीति में मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। भाषा का संयम, वाणी की मर्यादा का खयाल सभी को होना चाहिए।

एक समय था जब पक्ष विपक्ष आपसी बहस में मुद्दों पर लड़ते तो बहुत थे लेकिन अपनी अपनी गरिमा का भी खयाल रखते। बहुत कुछ बोल जाने पर भी माहौल हमेशा हलका रहता। गुदगुदाने के पल आते, हंसी ठहाके लगते। टीका टिप्पणी होती लेकिन शालीनता से। अब ऐसा नहीं। राजनीति का स्तर गिर रहा है। स्तरहीन राजनीति हो रही है। सब जानते हैं लेकिन बोली चाली में इसका असर दिखने लगा है जो असम्मान जनक नजर आता है। लोकतंत्र के लिए यह सबसे घातक दौर है। मुद्दों की राजनीति हाशिए पर चली जाएगी और चुनाव एक दूसरे को कोसने, भला बूरा कहने में ही लड़ लिए जाएंगे। गाली देने वाले और गाली खाने वाले, सभी इसे जनता की सहानुभूति पाने का हथियार समझकर कुछ भी बोल जाने का दुस्साहस करने लगेंगे। छोटे छोटे बच्चों में कट्टी बुच्ची को हमने देखा है। इसमें एक लड़कपन दिखाई देता था। उनकी लड़ाई में भी प्यार छुपा होता। आज के नेता भी इनसे सीख लें। राजनीतिक दुश्मनी अपनी जगह हैं लेकिन उसमें संयम और सम्मान को सदा उच्च स्तर पर प्राथमिकता दें। एक अलग ही वातावरण नजर आएगा।

आज जरूरी यह है कि वाणी से नहीं विवेक से, शब्दों से नहीं शराफत से, अपमान से नहीं अभिमान से, अशालीनता से नहीं अभिव्यक्ति से अपने आचरण में सुधार लाना होगा। राजनीतिक, धार्मिक और वैचारिक कट्टरता को सद्भावना, प्रेम और विनम्रता से इसे कम से कम न्यूनतम करने पर राजनीति और राजनीतिज्ञों की गरिमा भी बरकरार रहेगी और बल खाते जनता से जुड़े मुद्दों को बल मिलेगा।

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