रिमूवल विभाग: जब अफसरों को ज़मीन नहीं दिखती

*रिमूवल विभाग: जब अफसरों को ज़मीन नहीं दिखती*
इंदौर । नगर निगम का रिमूवल विभाग आज सिर्फ अतिक्रमण नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का स्मारक बनता जा रहा है। सवाल यह नहीं कि अतिक्रमण क्यों बढ़ रहा है, सवाल यह है कि उसे रोकने वाली व्यवस्था इतनी बेअसर क्यों हो चुकी है?
स्थिति चिंताजनक है। रिमूवल की जिम्मेदारी जिन अपर आयुक्त स्तर के अधिकारियों को दी गई है, उन्हें शहर की भौगोलिक हकीकत तक की स्पष्ट जानकारी नहीं। क्षेत्र, समस्या और प्राथमिकता तीनों को लेकर भ्रम है। ऊपर से नीचे तक संवाद और समन्वय नगण्य है। नतीजा यह कि मैदानी अमला अब आदेश नहीं, बल्कि मूड देखकर काम कर रहा है।
इसका सबसे खतरनाक संकेत यह है कि रिमूवल टीम पर से प्रशासनिक खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है। जब डर खत्म होता है, तो अनुशासन भी खत्म हो जाता है। यही कारण है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अब गंभीर प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि औपचारिक रस्म बनकर रह गई है।
विडंबना यह है कि निगम के इतिहास में ऐसा समय भी रहा है, जब लता अग्रवाल जैसे अधिकारियों के नेतृत्व में रिमूवल विभाग की पहचान थी। तब हालात ऐसे थे कि एक वायरलेस संदेश पर कर्मचारी और सुपरवाइजर हरकत में आ जाते थे। आज हाल यह है कि रिमूवल की शिकायत खुद आला अधिकारियों को समझ में नहीं आ रही कहां की है, किस स्तर की है और क्या प्राथमिकता है।
यह सिर्फ कार्यप्रणाली की कमजोरी नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति के पतन का मामला है। जब अफसर जमीन से कट जाते हैं, तो सिस्टम कागजों में उलझ जाता है। और जब सिस्टम कागजों में उलझे, तो सड़क पर अराजकता तय है।
शहर यह पूछने को मजबूर है
क्या नगर निगम किसी बड़े हादसे, किसी जनआंदोलन या किसी न्यायिक फटकार का इंतजार कर रहा है?
क्या फुटपाथ, सड़कें और बाजार यूं ही अव्यवस्था के हवाले छोड़ दिए जाएंगे?
रिमूवल विभाग को अब सिर्फ निर्देश नहीं, बल्कि नेतृत्व, जवाबदेही और भयमुक्त नहीं बल्कि भययुक्त प्रशासन की जरूरत है। वरना यह साफ है कि अतिक्रमण नहीं हटेगा, बल्कि निगम की साख और शहर का भरोसा लगातार हटता चला जाएगा।
अब फैसला निगम को करना है
व्यवस्था बहाल करनी है, या फिर विफलता को रोज़मर्रा की खबर बना देना है।

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