आज जिन्हें शह दे रहे हैं, वे ही कल मात भी दे देंगे -अन्ना दुराई

*आज जिन्हें शह दे रहे हैं, वे ही कल मात भी दे देंगे !*

*-अन्ना दुराई*

क्या हो गया यदि देश के मुख्य न्यायाधिपति पर जूता उछाल दिया। इस धरती पर जन्म लेने वाले प्रत्येक इंसान को भूलने की शक्ति मिली हुई है। बड़ी से बड़ी घटनाओं एवं दुर्घटनाओं को वह मिनिटों में भूल जाता है। बस चूक कहां हुई, ये समझ से परे है कि वह हिंदू मुस्लिम करना नहीं भूल पा रहा है। हमारे न्यायालय न्याय के मंदिर हैं। हमारे यहाँ तो मंदिर में दर्शन के लिए अंदर जाने से पूर्व जूते चप्पल बाहर उतारने की परंपरा है। ऐसे में न्याय के मंदिर में सनातन की रक्षा के नाम पर जूता फेंकना देश में तैयार किए जा रहे उस माहौल की ओर इशारा करता है जिसमें धर्म के नाम पर घमंड और अहंकार के सिवाय और कुछ नहीं है। अपने अपने धर्म के नाम पर गौरव होना चाहिए न कि गुरूर। धर्म हमें न्याय सिखाता है लेकिन यहां धर्म के नाम पर अन्याय की भाषा बोली जा रही है। धर्म के नाम पर एक दंभ पैदा कर दिया गया है जो नित नए प्रपंच पैदा कर रहा है। सब जानते हैं, ऐसे लोगों का मकसद अपने जाति धर्म की रक्षा नहीं बल्कि इसकी आड़ में कुछ और हासिल करना है। परिस्थितियाँ ऐसी निर्मित हो गई है कि अधिकांश दिग्गज मौन रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। आम नागरिकों की तो बिसात ही क्या। जीवन यापन के हर मोर्चे पर वह हमले झेल रहा है लेकिन चुप है। कुछ बोलने जाए तो बोलती बंद कर दी जाती है। आजकल नियम कायदे भी बनाए नहीं, बल्कि थोपे जाते हैं। पुलिस प्रशासन की भूमिका कई मौकों पर शांत मुद्रा में नजर आती है।

धर्म के नाम पर जो हो जाए कम है। इंसानियत, मानवता, सहिष्णुता गौण होती जा रही है। हर माँ की कोख से जन्म लेने वाले बालक को यह पता नहीं होता कि वह किस जाति या धर्म का है। ऐसे में धर्म के नाम पर कसूरवार ठहराने की परंपरा गलत है। अपराधी चाहे जिस जाति या धर्म का हो, अपराधी है। धर्म के नाम पर रियायत मखौल उड़ाने की प्रवृत्ति को जन्म देती है। कोई यह मान ले कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता तो यह सही नहीं है। मुखरता की जगह मौन होना चाहिए और मौन की जगह मुखरता लेकिन हो रहा इसके विपरीत है। घमंड और अहंकार में डूबे एक वर्ग की मुखरता बढ़ती जा रही है और सहने की शक्ति से आम आदमी मौन रहने को विवश होता जा रहा है। मिठा मिठा गप्प और कड़वा कड़वा थू, आज की सच्चाई बन गई है लेकिन यह भी तय है कि धर्म के नाम पर आज जिन्हें शह दी जा रही है, वे ही जब बात निजी स्वार्थ पूर्ति की आएगी तो एक दिन उन्हें मात भी दे देंगे। सरकारों को सचेत तो हो ही जाना चाहिए।

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