हे पत्रकारिता के मठाधीशों: हिंदी को माथे की बिंदी बने रहने दो, उसे चिंदी मत बनाओ

*हे पत्रकारिता के मठाधीशों: हिंदी को माथे की बिंदी बने रहने दो, उसे चिंदी मत बनाओ*

(निरुक्त भार्गव)

लो, फिर आ गया “हिंदी पत्रकारिता दिवस”! इस दिन की जितनी अहमियत ठीक 200 साल पहले थी, उससे कहीं ज्यादा आज के दौर में है. वो इसलिए नहीं कि भारतवर्ष में हिंदी का बेड़ा गर्क हो रहा है, बल्कि खास तौर पर इस कारण कि पत्रकारिता को तहस-नहस किया जा रहा है. मीडिया माध्यमों के पाठक और दर्शक वर्ग से ये उम्मीद करना बेमानी होगा कि वो हिंदी और पत्रकारिता की लगातार भद्द पिटने के कुत्सित प्रयासों के खिलाफ डटकर खड़े हों..!

कथित रूप से सबसे अधिक बिकने वाले और सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अख़बारों को उठाकर देखिये: सुबह से ही अनगिनत पाठकों का दिमाग चकराने लगता है. सांध्य दैनिकों की तो बात ही क्या करें! बड़े शहरों की बात करें या फिर राज्यों और देश की राजधानी से प्रकाशित समाचार-पत्रों की, बीते एकाध दशक से होड़ चल पड़ी है, मुख्य पृष्ठों पर लगभग सभी समाचारों के मुखड़े अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों से लिखे जाते हैं. अन्दर के पृष्ठों के क्या कहने, भाई लोग धड़ल्ले से ह्रदय को हार्ट की बजाय “हार्ड” और न्यायालयों द्वारा दिए गए स्थनागादेश को वेकेट करवाने को “वेकेंट” छपवाते हैं! बिना शिक्षण-प्रशिक्षण के तकनीकी, विधिक और पारंपरिक शब्दावली के साथ छेड़छाड़ तो अब सामान्य प्रचलन में है, आजकल की ‘स्वयं-भू’ पत्रकारिता में!

विसुअल मीडिया बोले तो चौबीस घंटे के खबरिया चैनलों का बाज़ार इन दिनों काफी गर्म है. चर्चा चाहे पहलगाम नरसंहार की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान पर हमला बोलने का हो या प्रयागराज के महाकुंभ के प्रचार-प्रसार का हो या फिर लोकसभा निर्वाचन-2024 का हो, महिला और पुरुष सूत्रधारों ने पत्रकारिता की साख का बट्टा ही बैठा दिया! आखिर क्योंकर इन माध्यमों के धुरंधरों ने पत्रकारिता के समस्त नियमों और कानूनों को ताक़ पर रख दिया? स्टूडियो में बहस के दौरान संचालनकर्ता स्त्री/पुरुष मेहमानों पर हमले करते देखे जा रहे हैं! तमाम बंदिशों के इतर धार्मिक, सामुदायिक, सामाजिक और कबीलों से जुड़े तानों-बानों को हर दिन, हर पल रौंदा जा रहा है! वस्त्रों की लियाकत और लफ़्ज़ों की शुचिता क्यों गायब होती जा रही है?

चलते-चलते इन्टरनेट-जनित नए मीडिया की बात भी कर लेते हैं: दिन-रात, हर रोज सबके मोबाइल फोन पर ये इतना शोर मचाते हैं कि बहुत कम सालों में इन माध्यमों ने आंख, कान और स्मृति दोष के मरीजों की जमात-सी खड़ी कर दी है! अपुष्ट सूचनाओं का मायाजाल, उपभोक्ताओं को भटकाए रखता है! शरारती वीडियो समूचे समाज को उद्वेलित किए हुए रहते हैं! षड़यंत्र और खुन्नसों के किस्से आम लोगों की जुबां पर होते हैं! किसी की टोपी उछालकर उसे अस्पताल भेजने के इंतजाम या फिर मोटी रक़म वसूलने के प्रमाण सबके सामने हैं ही! तथाकथित “विकसित” और “तेजी से विकासशील” देशों का जिक्र करें तो शायद भारत में होता होगा कि जवाबदेह और जिम्मेदार शख्सियतें इन माध्यमों पर लट्टू हो रही हैं!

तीखे सवाल मुझ से भी किए जाने चाहिए: आप अपने ही व्यवसाय और धंधे की जांघ क्यों और किसलिए उघाड़ते रहते हो? क्या ये आपका शगल है अथवा नकारात्मक चिंतन?…अभी तो मैं इस पाले में हूं, जिस दिन साधारण इंसान के ही पाले में समाहित हो जाऊंगा, तो संभव है कि कुछ नया और निर्णायक कर सकूं…!!!

*जान लीजिए:* लगभग दो शताब्दी पूर्व ब्रिटिशकालीन भारत में जब दूर-दूर तक मात्र अंग्रेजी, फारसी, उर्दू एवं बांग्ला भाषा में अखबार छपते थे, तब देश की राजधानी कलकत्ता में कानपुर के रहने वाले जुगल किशोर शुक्ल ने अंग्रेजों की नाक के नीचे हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की आधारशिला रखी. उस आधारशिला का नाम था “उदन्त मार्तण्ड”, जिसने अंग्रेजों में इस कदर खुजली कर दी कि उसका प्रकाशन डेढ़ वर्ष से अधिक न हो सका. इस साप्ताहिक का पहला अंक 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ, जिसे “हिन्दी पत्रकारिता दिवस” कहा गया. प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होने वाले इस अखबार में हिन्दी भाषा की ‘बृज’ और ‘अवधी’ भाषा का मिश्रण होता था. पत्र वितरण में अंग्रेजों द्वारा लगातार डाक शुल्क में छूट न दिये जाने के कारण इसका 79वां और आखिरी अंक दिसम्बर 1827 में प्रकाशित हुआ.

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