राजबाड़ा में दीपावली की रौनक पर निगम और ट्रैफिक की दोहरी मार!

*राजबाड़ा में दीपावली की रौनक पर निगम और ट्रैफिक की दोहरी मार!*

*सड़क-फुटपाथ पर अस्थायी बाजारों को जगह, स्थायी दुकानदारों के डिस्प्ले पर आपत्ति; यातायात पुलिस के वाहन प्रतिबंध से ग्राहक बाजार तक पहुंचने में परेशान, सालभर के घाटे की भरपाई की उम्मीद लगाए व्यापारियों का त्योहार ठप*
✒️*अक्षय जैन*
इंदौर। दीपावली का त्योहार व्यापारियों के लिए केवल एक पर्व नहीं, बल्कि पूरे साल के कारोबार का सबसे बड़ा अवसर होता है। राजबाड़ा और आसपास के पारंपरिक बाजारों के दुकानदार भी इसी उम्मीद में थे कि दीपावली पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ेगी। महीनों पहले से दुकानों में लाखों-करोड़ों रुपए का माल भर लिया गया। नई वैरायटी, आकर्षक कलेक्शन और त्योहार की विशेष तैयारियों के साथ व्यापारी सालभर के कारोबार में हुए घाटे की भरपाई की योजना बना रहे थे। लेकिन इस बार बाजार में ग्राहकों की रौनक के बजाय व्यापारियों को खाली दुकानों में ग्राहक का इंतजार करना पड़ रहा है। इसकी बड़ी वजह नगर निगम और यातायात पुलिस की अलग-अलग व्यवस्थाओं को माना जा रहा है।

राजबाड़ा क्षेत्र में नगर निगम की व्यवस्था पर पहला सवाल सड़क और फुटपाथ पर लगने वाले अस्थायी बाजारों को लेकर है। त्योहार के नाम पर सड़क किनारे बाजारों को जगह मिल गई। पूजा सामग्री की बिक्री की अनुमति के दायरे में दूसरी वस्तुओं का कारोबार भी फैलता दिखाई दिया। नतीजा यह कि स्थायी दुकानों तक पहुंचने वाले रास्ते संकरे हो गए। पैदल चलने वालों के लिए जगह कम हुई और ग्राहकों को बाजार में प्रवेश करने से पहले ही अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है।

दूसरी तरफ यातायात पुलिस ने व्यवसायिक बाजारों में वाहन प्रतिबंध की व्यवस्था लागू कर दी। सवाल यह है कि क्या बाजार की यातायात व्यवस्था सुधारने का मतलब ग्राहकों की पहुंच ही रोक देना है? वाहन प्रतिबंध के बाद आसपास के क्षेत्रों से आने वाले ग्राहक अपनी सुविधा के अनुसार दुकानों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। बुजुर्ग, महिलाएं और परिवार के साथ खरीदारी करने आने वाले लोगों के लिए परेशानी और बढ़ गई है। वाहन प्रतिबंध का विकल्प क्या केवल रोक लगाना है, या व्यवस्थित पार्किंग, नियंत्रित प्रवेश और निकास तथा जरूरत के अनुसार वैकल्पिक यातायात प्रबंधन भी प्रशासन की जिम्मेदारी है?

एक तरफ नगर निगम ने सड़क और फुटपाथ पर अस्थायी बाजारों की बसावट को जगह दी, दूसरी तरफ यातायात पुलिस ने वाहनों की आवाजाही सीमित कर दी। ऐसे में ग्राहक आखिर राजबाड़ा पहुंचे तो कैसे?

व्यापारियों की नाराजगी इसलिए भी है कि एक ओर वे अपनी दुकानों के सामने त्योहार के लिए सीमित डिस्प्ले करते हैं तो रिमूवल अमले को आपत्ति होती है, दूसरी ओर सड़क और फुटपाथ पर फैले अस्थायी कारोबार को लेकर प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती। वर्षों से संपत्तिकर, लाइसेंस शुल्क और अन्य वैधानिक कर चुकाने वाले स्थायी व्यापारियों के लिए यह स्थिति दोहरी मार जैसी है।

राजबाड़ा का व्यापारी केवल दुकान नहीं चलाता, वह कर्मचारियों को रोजगार देता है, सरकार को टैक्स देता है और पारंपरिक बाजार की आर्थिक गतिविधियों को जीवित रखता है। दीपावली के लिए उसने अपनी पूंजी माल में लगा दी है। अब जब ग्राहक ही बाजार तक नहीं पहुंच पा रहा, तो उस निवेश की भरपाई कैसे होगी? त्योहार का सीजन निकल जाने के बाद बचा हुआ माल और पूंजी की लागत व्यापारी के लिए अगली चुनौती बन जाएगी।

व्यापारियों का सवाल है कि बाजार को व्यवस्थित करने की कीमत क्या हमेशा स्थायी दुकानदार ही चुकाएगा?

नगर निगम और यातायात पुलिस दोनों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। सड़क और फुटपाथ अतिक्रमण मुक्त हों, पैदल यात्रियों को रास्ता मिले, लेकिन स्थायी बाजारों तक ग्राहकों की पहुंच भी सुनिश्चित हो। वाहन प्रतिबंध के साथ वैकल्पिक पार्किंग और नियंत्रित वाहन प्रवेश की व्यावहारिक व्यवस्था बनाई जाए।

राजबाड़ा को केवल हेरिटेज क्षेत्र बताकर उसकी तस्वीरें संवारने से काम नहीं चलेगा। यहां का पारंपरिक व्यापार भी इस विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दीपावली पर सड़कें भले अस्थायी बाजारों से भर गई हों, लेकिन यदि स्थायी दुकानों में ग्राहक नहीं पहुंचा तो यह कैसी बाजार व्यवस्था है? निगम और यातायात पुलिस को समझना होगा कि अतिक्रमण हटाने और यातायात नियंत्रित करने के नाम पर व्यापार का रास्ता ही बंद नहीं किया जा सकता। राजबाड़ा की विरासत बचानी है तो यहां के व्यापार और व्यापारी की आर्थिक सेहत भी बचानी होगी।

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