*पर्यूषण : आत्मशुद्धि का पर्व या प्रतिष्ठा प्रदर्शन का नया मंच?*
✒️*अक्षय जैन*
पर्यूषण महापर्व… यानी आत्मा की ओर लौटने के आठ दिन। तप, त्याग, संयम, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, क्षमायाचना और कर्मों की निर्झरा का अवसर। यह वह पर्व है, जिसमें जैन दर्शन व्यक्ति को संसार से नहीं, बल्कि अपने भीतर के विकारों से संघर्ष करना सिखाता है।
लेकिन क्या आज पर्यूषण की तस्वीर बदल रही है?इंदौर में
धर्मसाधना के बीच प्रतिष्ठा प्रदर्शन, वैभव दर्शन, पद-प्रतिष्ठा की चमक और सत्ता-संपर्क के प्रदर्शन की तस्वीरें भी दिखाई देने लगी हैं। बड़े मंच, विशिष्ट अतिथि, विशेष सम्मान, फोटो-वीडियो और सोशल मीडिया की सक्रियता—क्या यही हमारे धार्मिक उल्लास की नई परिभाषा बनती जा रही है?
सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक दिशा पर है।
जिस पर्व में अहंकार छोड़ने की साधना होनी चाहिए, वहां कहीं-कहीं अहंकार की सार्वजनिक प्रस्तुति तो नहीं हो रही? जिस पर्व में ‘मैं’ को छोटा और ‘आत्मा’ को बड़ा करने की बात है, वहां पद, प्रभाव और पहचान को बड़ा दिखाने की होड़ तो नहीं?
धर्मसभा में कौन बैठा, किसे मंच मिला, किसका स्वागत हुआ, किसके साथ तस्वीर आई यदि यही चर्चा का केंद्र बन जाए तो फिर हमें रुककर सोचना होगा कि हम पर्यूषण मना रहे हैं या अपनी सामाजिक हैसियत का उत्सव?
भव्यता अपने आप में गलत नहीं। संसाधन भी गलत नहीं। लेकिन जब साधना पीछे और प्रदर्शन आगे निकल जाए, तब धर्म के मूल उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पर्यूषण हमें यह नहीं सिखाता कि समाज हमें कितना बड़ा माने। वह सिखाता है कि हम स्वयं अपनी कमजोरियों को कितना पहचानते हैं।
शायद इस पर्यूषण एक प्रयोग किया जा सकता है
सम्मान कम, स्वाध्याय अधिक।
प्रदर्शन कम, प्रतिक्रमण अधिक।
वैभव कम, सेवा अधिक।
सत्ता-संपर्क का प्रदर्शन कम, समाजहित का उपयोग अधिक।
और सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति कम, अपने भीतर की उपस्थिति अधिक।
क्योंकि अंततः धर्मसभा की भीड़, मंच की भव्यता और कैमरों की चमक साथ नहीं जाती। साथ जाते हैं तो हमारे कर्म, हमारा आचरण और आत्मा की साधना।
इसलिए इस पर्यूषण एक सवाल खुद से जरूर पूछें
“मेरे पर्यूषण से मेरी तस्वीर कितनी बदली या मेरा चरित्र कितना बदला?”
यदि उत्तर भीतर से मिला, तो शायद हमने सच में पर्यूषण मनाया। वरना पर्व आया और चला गया और हम वहीं खड़े रहे, जहां पहले थे।






