वाणी संयम शक्ति का स्रोत है – साध्वी निर्वाणश्री

वाणी संयम शक्ति का स्रोत है – साध्वी निर्वाणश्री
वाणी संयम के महासाधक आचार्यश्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या साध्वीश्री निर्वाणश्रीजी के पावन सान्निध्य में ‘वाणी संयम दिवस’ पर विशेष उपक्रम हुए। पर्युषण पर्वाराधना में संभागी श्रावक समाज को संबोधित करते हुए विदुषी साध्वीश्री निर्वाणश्रीजी ने कहा – शुभ समय और शुभ घड़ी में माता देवानंदा ने चौदह स्वप्न देखे। ये महास्वप्न किसी महामानव के अवतरण के द्योतक थे। शुभ स्वप्न दर्शन से जीवन में विशेष प्रसन्नता मिलती है। ये विलक्षण स्वप्न 24 वें तीर्थंकर के अवतरण के संकेत हैं, यह ऋषभदत्त ने अपनी पत्नी से कहे। किंतु सौधर्मेन्द्र ने देव द्वारा गर्भ परिवर्तन ही करवा दिया। और पुनः त्रिशला रानी ने भी वही स्वप्न देखे। राजा सिद्धार्थ के आंगन में जगत पूज्य महावीर का अवतरण 2600 वर्ष पूर्व की विलक्षण घटना थी।
साध्वी डा. योगक्षेमप्रभाजी ने अपने प्रेरक वक्तव्य में भगवान अरिष्टनेमि के आठ पूर्व भवों की रोचक घटनाओं का विवेचन करते हुए मैत्री भाव के विकास की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा – मैत्री और शत्रुता के बीज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। यह हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर है कि हम किसे पोषण दें और किसे उखाड़ कर फेंक दें। मैत्री का महापर्व मैत्री का संवाहक है। हम प्राणी मात्र के प्रति मैत्रीभाव का विकास करें।
साध्वी मधुरप्रभाजी ने वाणी संयम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए मौन क्यों आवश्यक है, विषय पर उद्गार प्रकट किए। साध्वी लावण्यप्रभाजी ने ‘वाणी संयम’ पर मधुर गीतों से सबका मन मोहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ नमस्कार महामंत्र के उच्चारण व ध्यान-प्रयोग से हुआ। काजूपाडा ते. महिला मंडल की बहनों ने मंगलाचरण किया। मंच संचालन मैत्री पायल मांडोत ने किया। कार्यक्रम से पूर्व फादर डा. माइकल रोजारियो ने अपने विद्यार्थी वर्ग के साथ साध्वीश्री से जैन दर्शन पर मार्गदर्शन लिया। अणुव्रत समिति से राजकुमार चपलोत ने उनका परिचय दिया। तेरापंथी सभा, चेम्बूर की ओर से उन सबको साहित्य उपहार किया गया। मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में संगीता चंडकोतजी हेंडोरे ने साध्वीश्री के प्रवचन श्रवण का लाभ लिया।

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