आखिर कहां गुम हो गया ग्राहक?

*आखिर कहां गुम हो गया ग्राहक?*

*रक्षाबंधन से चार दिन पहले बाजार की खामोशी पर एक चिंतन*

रक्षाबंधन से मात्र चार दिन पहले, 24 अगस्त की शाम बाजारों का जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह केवल दुकानों की खाली सड़कों और खाली काउंटरों का चित्र नहीं है, बल्कि यह पूरे व्यापार जगत के लिए गंभीर चिंतन का विषय है।

जिस समय बाजारों में ग्राहकों की भीड़ होनी चाहिए, दुकानदारों के चेहरे पर उत्साह होना चाहिए, कर्मचारियों की व्यस्तता बढ़नी चाहिए और खरीदारी का माहौल बनना चाहिए, उस समय कई बाजारों में व्यापारी ग्राहक का इंतजार करते नजर आ रहे हैं।

*आखिर क्या हो गया बाजार को?*
*कहां गुम हो गया ग्राहक?*

क्या ग्राहक की खरीदारी की आदत बदल गई है? क्या ऑनलाइन बाजार ने उसकी दिशा बदल दी है? क्या महंगाई ने उसकी प्राथमिकताएं सीमित कर दी हैं? या फिर पारंपरिक बाजार स्वयं समय के साथ बदलने में कहीं पीछे रह गया है?

इन सवालों का जवाब केवल सरकार, ऑनलाइन कारोबार या ग्राहक से मांगना पर्याप्त नहीं होगा। व्यापारियों को भी अपने भीतर झांकना होगा।

आज का ग्राहक केवल दुकान पर सामान खरीदने नहीं आता। वह अनुभव, सुविधा, भरोसा, उचित मूल्य, नई पसंद और बेहतर व्यवहार चाहता है। यदि हम वर्षों पुरानी व्यापार पद्धति को ही अपना भविष्य मानकर बैठे रहेंगे तो आने वाला समय हमारे लिए और कठिन हो सकता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि कहीं-कहीं व्यापारी ने ‘ग्राहक आएगा तो व्यापार करेंगे’ को ही अपनी जीवनचर्या बना लिया है। लेकिन आज के प्रतिस्पर्धी दौर में ग्राहक का इंतजार करने से ज्यादा जरूरी है ग्राहक तक पहुंचना।

व्यापारी को बाजार में रौनक की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि रौनक पैदा करने की कोशिश करनी होगी।

त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते। वे बाजार के लिए अवसर होते हैं। रक्षाबंधन जैसे पर्व पर ग्राहक की जरूरत समझना, नई वैरायटी लाना, उचित कीमत रखना, दुकान का वातावरण बेहतर बनाना, डिजिटल माध्यमों से ग्राहकों तक पहुंचना और पुराने ग्राहकों से व्यक्तिगत संपर्क करना ये सब आज व्यापार की अनिवार्य जरूरतें बन चुकी हैं।

हमें यह भी समझना होगा कि व्यापार केवल आज की बिक्री का नाम नहीं है। व्यापार एक ऐसी व्यवस्था है जिसे मजबूत या कमजोर करने का असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है।

यदि आज का व्यापारी केवल मंदी की शिकायत करता रहेगा, ग्राहक के नहीं आने का इंतजार करता रहेगा और बाजार की बदलती परिस्थितियों के साथ स्वयं को नहीं बदलेगा, तो नुकसान केवल उसकी वर्तमान आय का नहीं होगा। धीरे-धीरे उसकी अगली पीढ़ी भी पारंपरिक व्यापार से दूरी बनाने लगेगी।

इसलिए आज जरूरत शिकायत की नहीं, चिंतन और परिवर्तन की है।

*बाजारों में ग्राहक फिर आएगा लेकिन इसके लिए बाजार को भी ग्राहक के अनुकूल बनना होगा।*

रक्षाबंधन से चार दिन पहले बाजार का यह दृश्य हमें चेतावनी दे रहा है। इसे केवल एक दिन की कम बिक्री समझकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा।

व्यापारी जागे, बाजार जागे और व्यापार की सोच बदले तभी आने वाली पीढ़ी के हाथों में केवल दुकान की चाबी नहीं, बल्कि मजबूत व्यापार का भविष्य भी सौंपा जा सकेगा।

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