*समाज की शक्ति 95% में है, सिर्फ 5% के वर्चस्व में नहीं*
✒️ *अक्षय जैन(मारू)*
किसी भी संघ या समाज की वास्तविक ताकत उसके व्यापक जनसमूह में होती है, न कि कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के हाथों में। दुर्भाग्य से वर्तमान सामाजिक परिवेश में कई स्थानों पर ऐसी प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है, जहाँ अनुभव, विद्वता, सेवा और नैतिक नेतृत्व की अपेक्षा आर्थिक प्रभाव, राजनीतिक समीकरण और व्यक्तिगत वर्चस्व को अधिक महत्व दिया जाने लगा है।
समाज के वरिष्ठजन, विद्वान और वर्षों से निस्वार्थ सेवा करने वाले लोगों का सम्मान केवल उनकी आर्थिक क्षमता से नहीं, बल्कि उनके ज्ञान, संस्कार और अनुभव से होना चाहिए। जब समाज अपने मार्गदर्शकों की उपेक्षा करने लगता है, तब निर्णयों में संतुलन और मर्यादा दोनों कमजोर पड़ने लगते हैं।
चिंता का विषय यह नहीं कि कुछ लोग प्रभावशाली बनना चाहते हैं, बल्कि यह है कि समाज का बड़ा और सजग वर्ग मौन रहता है। यही मौन धीरे-धीरे कुछ लोगों को यह भ्रम दे देता है कि वही पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि समाज की आत्मा उस 95 प्रतिशत वर्ग में बसती है, जो ईमानदारी से समाजहित चाहता है।
समय आ गया है कि यह मौन बहुमत जागृत हो। जागृति का अर्थ विरोध नहीं, बल्कि सकारात्मक भागीदारी है। समाज की व्यवस्थाएँ पारदर्शिता, संवाद, मर्यादा और सामूहिक निर्णयों पर आधारित हों। किसी भी प्रकार की व्यक्तिपूजा, अहंकार या आर्थिक दबदबे से ऊपर उठकर समाजहित को सर्वोपरि रखना ही स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था का आधार है।
यह प्रश्न किसी एक संघ या संस्था तक सीमित नहीं है। विभिन्न सामाजिक संगठनों में ऐसी चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। इसलिए आवश्यकता नई सोच, नए नेतृत्व और नई सामाजिक चेतना की है, जहाँ हर व्यक्ति की बात सुनी जाए, विद्वानों का सम्मान हो और निर्णय समाज की सामूहिक भावना के अनुरूप लिए जाएँ।
जब 95 प्रतिशत समाज जागरूक होकर मर्यादा, नैतिकता और संगठन की भावना के साथ आगे आएगा, तभी संघ मजबूत होगा, समाज सशक्त बनेगा और आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ, संस्कारित एवं आदर्श नेतृत्व मिल सकेगा। यही समय की पुकार है और यही समाज की सही दिशा भी।






