अड़ियल नेतृत्व और बढ़ता विवाद: समन्वय की राह क्यों बंद

*अड़ियल नेतृत्व और बढ़ता विवाद: समन्वय की राह क्यों बंद?*
इंदौर । श्वेतांबर जैन महासंघ न्यास के भीतर चल रहा मौजूदा विवाद अब केवल एक आयोजन या मतभेद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह नेतृत्व शैली और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। जिस समय संवाद, समन्वय और परस्पर समझ के माध्यम से समाधान निकाला जा सकता था, उस समय नेतृत्व का कठोर और अड़ियल रवैया स्थिति को और उलझाता दिखाई दे रहा है।
सूत्रों के अनुसार, न्यासियों के बीच संवाद स्थापित कर विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की भावनाएं सामने आई थीं, लेकिन इन्हें गंभीरता से लेने के बजाय नेतृत्व ने अनसुना कर दिया। इतना ही नहीं, जब एक करीबी सहयोगी ने तालमेल की पहल की बात उठाई, तो उसे ही झिड़क दिया गया। यह व्यवहार न केवल आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल उठाता है, बल्कि संगठनात्मक परिपक्वता की कमी को भी दर्शाता है।
स्थिति की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले लोग भी अब असंतोष महसूस कर रहे हैं। हालांकि वे सार्वजनिक रूप से कुछ कहने से बच रहे हैं, लेकिन दबी जुबान यह स्वीकार कर रहे हैं कि नवकारसी विवाद को अनावश्यक रूप से जीवित रखा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि जब झुककर, क्षमा और विनम्रता के साथ समाधान संभव है, तो फिर टकराव को क्यों बढ़ाया जा रहा है?
जैन दर्शन का मूल आधार ही क्षमा, अहिंसा और समरसता है। ऐसे में नेतृत्व से अपेक्षा की जाती है कि वह इन मूल्यों को आत्मसात करते हुए विवादों का समाधान करे। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां इसके विपरीत संकेत दे रही हैं। यदि समय रहते समन्वय की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो यह विवाद संगठन की एकता और सामाजिक समरसता दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है नेतृत्व ने अनजाने या जानबूझकर अपने विरोधियों को एकजुट होने का अवसर दे दिया है। जहां संवाद से मतभेद सुलझ सकते थे, वहां टकराव ने विरोध को और संगठित कर दिया है। यह स्थिति भविष्य में नेतृत्व के लिए और बड़ी चुनौती बन सकती है।
*अब आवश्यकता है आत्ममंथन की* नेतृत्व को यह समझना होगा कि कठोरता और अहंकार से नहीं, बल्कि संवाद, सहिष्णुता और क्षमा से ही संगठन मजबूत होता है। यदि महासंघ को एकता और विश्वास की डोर में बांधे रखना है, तो अड़ियल रवैये को त्यागकर समन्वय की राह अपनानी ही होगी।

2479 views