*महासंघ की कार्यशैली पर उठते सवाल, एकता के मूल उद्देश्य से भटकाव के आरोप*
इंदौर । (धर्म संस्कृति संवाददाता) श्वेतांबर जैन महासंघ, जिसे सकल समाज के बीच एकता और समन्वय का सूत्र बनाने के पवित्र उद्देश्य से डॉ. प्रकाश जी बांगानी, चंदनमल जी चोरड़िया और कैलाश जी नाहर जैसे वरिष्ठजनों ने स्थापित किया था, आज अपनी ही कार्यशैली को लेकर विवादों में घिरता नजर आ रहा है।
समाज के विभिन्न वर्गों में यह चर्चा तेज है कि वर्तमान नेतृत्व की कार्यप्रणाली न केवल विवादास्पद होती जा रही है, बल्कि उससे समाज की एकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। आरोप है कि जिन लोगों ने संगठन की कमान संभाली, वे अब उस मूल भावना से दूर होते दिखाई दे रहे हैं, जिसके आधार पर इस मंच का निर्माण हुआ था।
सूत्रों के अनुसार, वर्तमान नेतृत्व द्वारा अपने प्रतिस्पर्धी दावेदार के साथ पूर्व में किए गए लिखित समझौते से पीछे हटने की बात भी सामने आई है। इस घटनाक्रम ने महासंघ के भीतर असंतोष को और गहरा कर दिया है। बताया जा रहा है कि करीब आठ से अधिक न्यासी सदस्यों ने नेतृत्व से उनके वादों और लिखित समझौतों का हवाला देते हुए नैतिक आधार पर पद त्यागने का आग्रह किया है।
हालांकि, अब तक इस पर कोई ठोस निर्णय सामने नहीं आया है। वहीं, आलोचकों का आरोप है कि वर्तमान नेतृत्व स्थिति को सुलझाने के बजाय “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाते हुए आंतरिक समीकरणों को साधने में लगा हुआ है, जिससे संगठन में दरार और गहरी होती जा रही है।
समाज के वरिष्ठजनों का मानना है कि यदि समय रहते संवाद, पारदर्शिता और नैतिक प्रतिबद्धता को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो महासंघ की विश्वसनीयता और उसके मूल उद्देश्य दोनों पर प्रश्नचिह्न लग सकते हैं।
ऐसे में सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या नेतृत्व आत्ममंथन कर संगठन की एकता को पुनः स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाता है, या यह विवाद आने वाले समय में और व्यापक रूप लेगा।






