समाज की धरोहर या निजी नियंत्रण का प्रयोगशाला

समाज की धरोहर या निजी नियंत्रण का प्रयोगशाला?*
समाज की संस्थाएं विश्वास पर चलती हैं, प्रपंच पर नहीं। श्री जैन श्वेतांबर महासंघ, जो वर्षों से समाज की आस्था, एकता और लोकतांत्रिक परंपराओं का प्रतीक रहा है, आज स्वयं सवालों के कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। यह स्थिति किसी व्यक्ति विशेष के कारण नहीं, बल्कि उन संकेतों के कारण है जो महासंघ की कार्यप्रणाली के भविष्य को लेकर गहरी चिंता उत्पन्न कर रहे हैं।
सबसे गंभीर प्रश्न महासंघ के संविधान को लेकर उठ रहे हैं। क्या संविधान में बदलाव की कोई तैयारी चल रही है? यदि हाँ, तो वह किन परिस्थितियों में और किसकी सहमति से? संविधान कोई साधारण कागज नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक संप्रभुता का दस्तावेज है। इसमें परिवर्तन का अधिकार केवल सीमित व्यक्तियों के पास नहीं, बल्कि पूरे समाज की सहमति से ही संभव और उचित है।
ट्रस्टी चुनाव की समय सीमा और प्रक्रिया में संभावित बदलाव की चर्चा भी समाज में असहजता पैदा कर रही है। लोकतंत्र का मूल तत्व है – निश्चित समय पर, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव। यदि चुनाव की प्रक्रिया या समय सीमा को सुविधानुसार बदला जाता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ न्याय नहीं, बल्कि उनके साथ प्रयोग माना जाएगा।
महासंघ की संघीय संरचना, जो विभिन्न इकाइयों की भागीदारी और संतुलन पर आधारित है, उसकी आत्मा ही उसकी ताकत है। यदि निर्णय प्रक्रिया केंद्रीकृत होती है और अधिकार सीमित हाथों में सिमटते हैं, तो यह संघीय ढांचे की मूल भावना के विपरीत होगा। समाज यह जानना चाहता है कि क्या महासंघ सहभागिता के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है या नियंत्रण के मार्ग पर?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या समाज की संस्था को समाज की सामूहिक चेतना के अनुरूप संचालित किया जाएगा, या फिर यह केवल कुछ व्यक्तियों के निर्णयों तक सीमित रह जाएगी? समाज की संस्थाएं निजी स्वामित्व नहीं होतीं। वे सार्वजनिक विश्वास की धरोहर होती हैं, जिनकी जवाबदेही समाज के प्रति होती है।
यह समय स्पष्टता का है, संवाद का है और विश्वास को मजबूत करने का है। यदि कोई बदलाव प्रस्तावित है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि कोई निर्णय लिया जा रहा है, तो उसमें समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। पारदर्शिता ही विश्वास की नींव है, और विश्वास ही किसी भी संस्था की सबसे बड़ी पूंजी।
समाज मौन दर्शक नहीं है। समाज सजग है, सचेत है और अपनी संस्थाओं की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। महासंघ की मजबूती समाज की भागीदारी में है, न कि निर्णयों के केंद्रीकरण में।
समाज की संस्थाएं समाज की ही रहें । यही अपेक्षा, यही संकल्प।
*अक्षय शांतिलाल जैन (मारू)*
9425060200

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