राजबाड़ा क्षेत्र… मतलब—शहर की आत्मा का साप्ताहिक ट्रैफिक टेस्ट।

*मेरा राजबाड़ा
रविवार, राजबाड़ा और पट्टी-बंधी आँखें
रविवार का दिन…
राजबाड़ा क्षेत्र…
मतलब—शहर की आत्मा का साप्ताहिक ट्रैफिक टेस्ट।
सड़क और फुटपाथ आज अपने मूल उद्देश्य को भूल चुके थे। वे अब चलने के लिए नहीं, बसने के लिए थे। कब्जेधारियों की जमात ऐसे डटी थी मानो यहीं से स्वतंत्रता संग्राम शुरू होना हो। फुटपाथ पर दुकानें, दुकानों के आगे काउंटर, काउंटर के आगे ग्राहक और ग्राहक के आगे मजबूरी …पैदल चलने वाला आखिर जाए तो जाए कहाँ?
इसी बीच नगर निगम की पीली गाड़ी—जिस पर बड़े गर्व से लिखा था “रिमूवल विभाग”—मुस्तैदी से तैनात थी। गाड़ी खड़ी थी, कर्मचारी खड़े थे, मगर कार्रवाई… वह शायद रविवार की छुट्टी पर थी।
पीली गाड़ी कुछ ऐसी लग रही थी जैसे पुलिस थाने के सामने खड़ी चोरी की बाइक सबको दिखती है, पर किसी को छूनी नहीं।
दुकानें सड़क तक ऐसे फैली थीं मानो सड़क ने खुद आमंत्रण भेजा हो
“आओ, मेरे सीने पर ही कारोबार कर लो।”
पैदल चलना अब एक एडवेंचर स्पोर्ट बन चुका था। एक कदम चूको तो या तो ठेले से टकराओ या भाव-ताव में उलझ जाओ।
गोपाल मंदिर के सामने गुमटियों का दृश्य तो मानो फैशन वीक था
“डेढ़ सौ… डेढ़ सौ… पूरे कपड़े डेढ़ सौ!”
कपड़ों की चिल्ला-पुकार इतनी तेज़ कि लगता था भगवान भी अंदर से झाँककर पूछ रहे होंगे
“भाई, मोक्ष मिलेगा या मोल-भाव?”
यह अजीबो-गरीब सूरत-ए-हाल था अपने इंदौर का—
जहाँ नगर निगम लाख दावे करे कि शहर अतिक्रमण मुक्त है,
मगर राजबाड़ा का फुटपाथ उसकी आँखों पर बँधी पट्टी बन चुका है।
यह पट्टी अंधेपन की नहीं, सुविधाजनक दृष्टिहीनता की है—
जहाँ सब दिखता है,
पर देखने की ज़रूरत नहीं समझी जाती।
और रविवार की शाम तक,
राजबाड़ा फिर साबित कर देता है—
यह शहर केवल साफ़ नहीं,
व्यंग्य में भी नंबर वन है।

2077 views