*पहले राजा सरकार थी, अब सरकार ही राजा है !*
*-अन्ना दुराई*
बदला कुछ भी नहीं है। पहले राजा सरकार थी और अब सरकार ही राजा। पहले राजा के राज में आम नागरिक गुलामी सा जीवन जीते थे तो आज सरकार के राज में स्थिति में कोई खास सुधार प्रतीत नहीं होता। सोचें तो राजशाही और लोकशाही में फर्क नजर नहीं आता। तब लगान देते थे। अब टैक्स के रूप में सरकारों की जेब भरते हैं। भारत में करीब 65 प्रकार के टैक्स हैं जो भिन्न भिन्न सैकड़ों प्रकार के माध्यम से वसूले जाते हैं। कह सकते हैं, हम सड़क पर निकलते हैं तो सरकार हमारे साथ चलती है। कहीं अपने लिए कुछ लेते हैं तो सरकार भी आनंद लेती है। कहीं कुछ खाते हैं तो हम अकेले नहीं होते। सरकार भी हमारे साथ भोजन ग्रहण करती है। यानि उठते बैठते हम किसी न किसी रूप में सरकार को टैक्स अदा करते हैं।
हालाँकि आम नागरिकों के धैर्य, सहनशक्ति और साहस की प्रशंसा करना होगी कि हर हाल में वह खुश दिखाई देती है। कभी उफ नहीं करती। सोचता हूँ कि सरकारें हमें देती क्या है, सिर्फ लेती ही लेती है। सौ रूपए लेकर 10-20 वापस दे दे तो क्या मतलब के। सुबह के दातून से शुरू होने वाला सफर दिन से लेकर रात तक भिन्न भिन्न प्रकार की टैक्स पेड वस्तु के उपयोग से होता है। पहले आयकर भरकर अपनी कमाई सुरक्षित करो और फिर उसी कमाई का एक बड़ा हिस्सा जगह जगह टैक्स में दो। हिसाब लगाओ हम रोजमर्रा के जीवन में कितना अंश सरकार को देते हैं। रहो तो टैक्स, उठो तो टैक्स, बैठो तो टैक्स, चलो तो टैक्स, खाओ तो टैक्स। और तो और कोई भी काम कराना हो तो रिश्वत अलग दो। मानना पड़ेगा जनता को, अपने छोटे छोटे काम रिश्वत देकर कराती है। उसमें भी खुश होकर मिठाई बांटती है। जलन तब होती है जब हम आज के नेताओं और अधिकारियों का ऐशो आराम वाला जीवन देखते हैं। क्या किसी राजा से ये कम लगता है। पहले घोड़ा बग्घी एवं दरबान होते थे तो अब बड़े बड़े काफिले और ढेरो सुरक्षाकर्मी। सरकारों का क्या जब मन करे जैसा नियम बना दो। कोई रोक टोक नहीं। आगे सोचों ना पीछे। फिर नियमों की आड़ में आम जनता परेशान होय तो होय। विभिन्न गैर वाजिब योजनाओं एवं कार्यों में कमीशन के लिए लाखों करोड़ों खर्च कर दो। कमाई के लिए ठेके दे दो। एक क्लिक से करोड़ों रुपये बांट दो। राजा तो अपनी चेन अँगूठी बतौर ईनाम देते थे। यहां तो एक एक करोड़ रूपए तक ईनाम में दे दिए जाते हैं।
सरकारों का अपनी जनता के प्रति सोच उन्हें लाचार और निकम्मा बनाने की बजाय, काबिल और आत्म सम्मान से भरा जीवन देने का होना चाहिए। अपने अधिकारों के प्रति सचेत तो जनता को भी होना पड़ेगा नहीं तो टाईम पास के बहुत से साधन हैं, उन्हें आजमाते रहिए। हिन्दू मुस्लिम की बहस में उलझकर सामने दिखाए जाने वाले खतरों से बचते बचाते रहिए।
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