*धर्म मे श्रद्धान ही सुख का कारण है- आचार्य सौरभसागरजी*
जन्म के बाद माता-पिता सर्वप्रथम बच्चों को संस्कारित करने का कार्य करते हैं, जितना जतन जन्म के बाद किया जाता है यदि वही कार्य शिशु के गर्भ में रहने पर किया जावे तो आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त होते हैं गर्भवती माता को यदि धार्मिक कथाएं , प्रभु की वात्सल्य लीलायें , संस्कृत एवं गणित आदि की चर्चाएं करते रहे तथा परिवार में प्रसन्नता का वातावरण रहे तो जन्म के बाद वे सारे लक्षण आश्चर्यजनक रूप से शिशु में पाए जाते हैं ,सूरजमल विहार सभागृह दिल्ली में आयोजित विद्वत संगोष्ठी में ज्योतिषाचार्य एम के जैन ने उक्त उद्गार व्यक्त किये
प्रमुख संयोजक देवेंद्र सिंघई एवं आशीष जैन ने बताया कि आचार्य श्री सौरभसागरजी मुनिमहाराज के सानिध्य में 6 सत्रों में आयोजित तीन दिवसीय संगोष्ठी में विभिन्न प्रांतो से सम्मिलित विद्वानों ने उद्बोधन दिया, आचार्य श्री सौरभसागरजी मुनि महाराज ने कहा कि आगम अनुसार धार्मिक मंत्र तो हमारी रगो में दौड़ते हैं लेकिन श्रद्धान कम होता जा रहा है और परिवार में यही दुख का कारण है ,हमें धर्म के प्रति श्रद्धा धारण करने की आवश्यकता है
विभिन्न विषयों पर आयोजित सत्रों में श्री विकास जैन म्वालियर, श्री अरुणभैयाजी उज्जैन, श्रीमती सपना जैन, श्रीमती सोनीका जैन , पं. नितिन जैन इन्दौर ,श्री रविगुरुजी दिल्ली, श्री हुकुमचंद जैन आदि ने अपने विचार व्यक्त किये,
सम्मिलित हुए 25 अतिथि विद्वानों का सम्मान श्री संदीप जैन, अविनाश जैन ,आदेश जैन एवं विमल जैन ने किया,
कार्यक्रम का शुभारंभ ज्योतिषाचार्य श्री एम के जैन एवं श्री आलोक जैन ने दीप प्रज्वलित कर किया, संचालन पंडित दीपेश जैन एवं आशीष जैन ने किया आभार अध्यक्ष श्री संजीव जैन ने माना






