कहा है खुमारी वाला हमारा समाज : हार्दिक हुंडिया ।
ख़ुद के भव के साथ साथ हमारा भी भव और परभव बिगाड़ने वाले कुसाधु को वापस संसार में भेजो ।
समाज , ग़लत कार्य करने वाले को समाज का डर था । कोई जैन साधु , साधु वेश में यदि धर्म के नाम धंधा करता है , वो साधु की थोड़ी भी बात समाज के किसी भी अग्रणी महानुभाव के पास भी आती थी , तो वो अग्रणी तुरंत साधु को बोल देता था की साधु वेश में ये काम बंद करो । साधु वेश में ग़लत काम करने वालो की भी समाज का डर रहता था । हार्दिक हुंडिया ने कहा की संघ माँ बाप है , साधु भूल करे तो श्रावक सुधारते है ! आज कहा है ये खुमारी वाले श्रावक ? आज कई साधु चातुर्मास करने आते है तो पहले से तय करते है की चातुर्मास में जो भी इंकम होगी उसमे से ४० टका या उनके ऊपर हम लेंगे । ऐसे साधु को साथ सहकार देने वाले ठग भक्तों की भी अब कमी नहीं है । साधु चातुर्मास करते है उपाश्रय में , लेकिन उनके कार्य होते है प्राइवेट में , जैसे किराए पे एसी हाल , कोई मैदान जहाँ टेंट बांध के प्रसंग करना । ताकी वहाँ जो भी इनकम हो उन पर पूरा इनकम हक्क उनका रहे । उनको साथ देने वाले को केश रकम बिना ब्याज , बिना लिखापट्टी किया लाखो रुपया मिलता है । एक पैसा , ऊपर से समाज में नाम , मान , इज्जत सब कुछ मिल जाता है । पहले समाज में खुमारी थी क्युकी संघ में ट्रस्टी धर्म को समझते थे अब धर्म की व्याख्या कुछ संतों और उनके भक्तों ने बदल दी है। अब थोड़ा इन्वेस्ट करके मंदिर बनाओ और मंदिर के साथ साथ , भोजन शाला , धर्म शाला बनाकर कैसे समाज से धर्म के नाम बेवक़ूफ़ बनाकर पैसा बोली के नाम लिया जाये । लाखो का इन्वेस्टमेंट और करोड़ो की इनकम । धर्म जो मोक्ष ले जाता है वो आज धंधा बन गया है । जो मुमुक्ष दीक्षा लेते थे वो ख़ुद की आत्मा के साथ साथ हमारा भी कल्याण की भावना रखते है । आज परिस्थिति चेंज ? प्रतिष्ठा , दीक्षा , उपधान में धर्म की भावना कम रूपिया ज़्यादा से ज़्यादा इनकम कैसे हो ? हार्दिक हुंडिया की तमाम जैन धर्म प्रेमियो से बिनती है की मनुष्य भव हमे मिला ये हमारा सौभाग्य है । जैन धर्म मिला ये हमारा महा सौभाग्य है । जन्म जैसा कोई रोग नहीं है उनका इलाज सिर्फ मौत है । खाली हाथ आये है , खाली हाथ जाना है । सब कुछ छोड़कर जाना है तो जैन धर्म की एक बात हम हमारे जीवन में क्यों नहीं उतारते ? करण, करावन और अनुमोदन का मंत्र जीवन में समजो ? ग़लत साधु या ग़लत साधु के कार्य को साथ देकर पाप के भागीदार बनकर ये भव और परभव दोनों ना बिगडे ये समजकर आगे बढ़े ये ही उच्च भावनाओ के साथ
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