*सवाल खड़े रह जाते हैं !*
*-अन्ना दुराई*
एक अजीब सा मंजर है। राजनीति का नया दौर है। यहां सवाल विपक्ष से होते हैं। जवाब भी विपक्ष को देना है। आम जनता से जुड़े मुद्दे विपक्ष को उठाना है। उनका निराकरण भी उन्हें ढूंढना है। कारण साफ है, मुद्दे उठते हैं पर सत्ता पक्ष का मौन भारी पड़ जाता है। सवाल उठते हैं पर शांति छा जाती है। आंदोलन होते हैं लेकिन अनर्गल आरोप का शिकार बनाने के प्रयास होते हैं। सबूत पेश किए जाते हैं पर दोषियों की पेशी नहीं होती। गुनाहगार के नाम सामने होते हैं किंतु गवाही नहीं होती। कहने से तात्पर्य यह है कि मूल विषय वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं।
समझ नहीं आता सरकार जितनी शक्ति का उपयोग मुद्दों की खिल्ली उड़वाने में करती है, यदि उसका सही उपयोग करे तो बहुत सी चीजें हल हो सकती है। यदि कुछ गलत हुआ है, या हो रहा है तो उसे दुरुस्त करने की कवायद क्यों नहीं की जा सकती। बस सरकार अपनी सारी ताकत का इस्तेमाल गलत दिशा में करती रहती है। सवाल उठाने वाले हर संगठन या व्यक्ति को सत्ता पक्ष का सर्टिफिकेट मानों पहले से मिला हुआ है। सोचता हूँ, क्या हर मुद्दा गलत है। क्या सबके सब झूठे हैं। क्या सब के सब विदेशी ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं। क्या पैसा लेकर कोई अपनी खुद की जान जोखिम में डाल सकता है। क्या सबके सब देश में अराजकता फैलाने के लिए अपना घर बार, माता पिता, भाई बहन को छोड़कर बाहर निकले हैं। क्या सबके सब भ्रम फैलाकर देशवासियों को बरगलाने के काम में जुटे हैं। क्या सब के सब अपने देश से प्रेम नहीं करते, वे देशद्रोही राष्ट्रद्रोही हैं। क्या सबके सब धरना, प्रदर्शन बेकार में होते हैं। लोग यूँ ही भूख हड़ताल करके अपने शरीर को क्षति पहुँचाते हैं।
सत्ता पक्ष येन केन प्रकारेण अपनी ताकत का इस्तेमाल कर विभिन्न मुद्दों पर लगातार हो रहे विपक्ष एवं युवाओं के प्रदर्शन को असफल बताने में जुटा है लेकिन मुद्दों की गंभीरता को देखते हुए अभी तक कोई कदम नहीं उठाए हैं। यहां बात प्रदर्शनों के सफल असफल होने की नहीं बल्कि उन मुद्दों की है जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। सत्ता पक्ष ईमानदार है तो सामने दिख रही हर बुराई को आँखों पर पट्टी बांधकर उसे नजरअंदाज करने की बजाय आँखे खोलकर सच्चाई जानने समझने का प्रयास क्यों नहीं करता है। यही कारण है कि विपक्ष के यह आरोप अपने आप साबित होते दिखाई देते हैं कि यह सब क्यों और किसके इशारे पर हो रहा है। सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलता है, यह समय समय पर दिखता है लेकिन तय है कि जब चक्र घुमता है तो घमंड और अहंकार उतनी ही तेजी से उतरता भी है।
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