*सिंहासन खाली करो कि जनता
*-अन्ना दुराई*
“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” सन् 1974 में पटना के गांधी मैदान में यह नारा लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने दिया। तब एक नारा और चला, “संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है”। दोनों ही नारों ने असर दिखाया और केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी। वर्तमान में देखें तो अब पात्र बदल गए, परिदृश्य भी बदल गया लेकिन ये नारे मौजूं दिखाई दे रहे हैं। हालात ही कुछ ऐसे हैं। छात्र आंदोलन सहित पिछले दिनों के कुछ ज्वलंत मुद्दों पर विपक्ष की घेराबंदी ने सरकार को अपनी लंबी खामोशी तोड़ने के लिए मजबूर किया है। अर्सा हो गया, सत्ता पक्ष एक अलग ही तरह के घमंड और अहंकार में नजर आता रहा। बड़े से बड़े घटनाक्रम और घोटालों की सुगबुगाहट पर सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया रहित शैली ने लगातार विपक्ष के प्रतिकार को उनकी झुंझलाहट में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
सरकार ने एक ऐसी राह पकड़ी जिसमें अन्य किसी का कोई स्थान नजर नहीं आया। सरकार अपनी ढपली, अपनी राग के साथ अकेली सूनी सड़कों पर दौड़ती रही। सत्ता पक्ष की डिक्शनरी में विपक्ष नाम का कोई शब्द दिखाई नहीं पड़ता था। जो करना है करो, बाकि उनकी टीम संभाल ही लेती है। हो आज भी वही रहा है लेकिन इस बार सत्ता पक्ष को भी मोर्चे पर आकर हाथ बढ़ाने को मजबूर होना पड़ा है। हर बार की तरह आरोप लगाने वालों के चरित्र हनन का दांव चल नहीं पा रहा है। सत्ता पक्ष और उनके समर्थकों के तरकश से एक एक करके सारे तीर चल गए लेकिन विशेष कुछ हो नहीं पाया है। सत्ता पक्ष ने विपक्ष के विरुद्ध धरना प्रदर्शन कराकर अपने लोगों के खामोश विरोध और व्याकुलता को दबाने की भी कोशिश कर ली। यहां तक कि पड़ने वाली गालियों में से सहानुभूति ढूंढ लेने और पाने के प्रयास तक विफल होने लगे हैं।
किसानों की तरह लगता है, अब छात्रों ने भी ठान ली है। पतीला जब गरम होता है। अपने ऊपर ढकी प्लेट को भी ले उड़ता है। गर्म मुद्दों की भांप तैयार है, सिर से छत उड़ाने के लिए। गलत को गलत कहने की शक्ति सत्ता पक्ष को जुटाना होगी। सच को झुठलाने के तौर तरीके अपनाने की बजाय इसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। आने वाले सवालों को सुनने की हिम्मत जुटाई तो इसमें समस्याओं के हल भी निकलेंगे।
विपक्ष तो अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहा है लेकिन अब जनता के भी विपक्ष बनकर सड़कों पर उतरने से एक और एक ग्यारह हो गए हैं। जन आक्रोश साफ दिख रहा है। सत्ता पक्ष ने खासा समय इतिहास को बदलने में बिताया है। जरूरत इस बात की है कि आम आदमी का भविष्य सुधरे, शैक्षणिक धाँधलियों, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और जन समस्याओं से मुक्ति मिले। इतना जरूर है, सब ऐसे ही चलता रहा, इग्नोरेंस बढ़ती रही, जायज मुद्दे टलते रहे तो इतिहास बदलने वालों के भी खुद इतिहास बनते ज्यादा देर नहीं लगेगी।
402 views





