*धर्ममय होगा इंदौर या धर्म वैभव की होगी प्रतिस्पर्धा?*
*अक्षय जैन*
*50 स्थलों पर 450 से अधिक साधु-साध्वियों का चातुर्मास* आत्मकल्याण का अवसर या आयोजनों का महाउत्सव?
इस वर्ष इंदौर जैन समाज के लिए ऐतिहासिक वर्ष बनने जा रहा है। शहर के लगभग 50 चातुर्मास स्थलों पर 450 से अधिक साधु-साध्वियों का सान्निध्य मिलेगा। तपागच्छ, त्रिस्तुतिक, स्थानकवासी, समता संघ, खरतरगच्छ और दिगंबर परंपरा के अनेक पूज्य आचार्य, मुनिराज एवं महासतियां चार माह तक धर्मधारा प्रवाहित करेंगे। पर्युषण, संवत्सरी, प्रवचन, स्वाध्याय और तप-आराधना का वातावरण निश्चित ही पूरे शहर को धर्ममय बना देगा।
लेकिन हर चातुर्मास के साथ कुछ प्रश्न भी जन्म लेते हैं।
क्या चार माह तक इंदौर वास्तव में धर्ममय होगा, या फिर धर्म वैभव की प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय लिखा जाएगा?
अब चातुर्मास की चर्चा यह नहीं होती कि किस स्थान पर कितनी आत्मसाधना होगी, बल्कि यह होती है कि कहाँ का स्वामी वात्सल्य सबसे स्वादिष्ट होगा, किस स्थान की प्रभावना सबसे आकर्षक होगी, कहाँ सबसे अधिक प्रतियोगिताएँ होंगी, किस मंच पर सबसे बड़े नेता, मंत्री, सांसद या उद्योगपति मुख्य अतिथि बनेंगे और किस स्वागत समिति के बैनर सबसे बड़े दिखाई देंगे।
मानो चातुर्मास नहीं, चार माह का धार्मिक महोत्सव चल रहा हो, जहाँ श्रद्धा के साथ-साथ प्रतिष्ठा भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।
*सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि 450 से अधिक* *साधु-साध्वियों का सामूहिक सान्निध्य समाज को क्या नई दिशा देगा?*
क्या इन चार महीनों में कोई ऐसा संकल्प लिया जाएगा कि इंदौर का जैन समाज शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा संस्थान खड़ा करेगा? निर्धन विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति कोष बनाएगा? किसी अस्पताल, गौशाला, पर्यावरण, जल संरक्षण या मानव सेवा की स्थायी योजना शुरू करेगा?
क्या समाज के भीतर वर्षों से चली आ रही एक-दूसरे को गिराने, आलोचना करने और गुटबाजी की प्रवृत्ति समाप्त होगी?
क्या धनाढ्य और सामान्य श्रावक के बीच बना अदृश्य अंतर मिटेगा? क्या मंदिरों और धर्मसभाओं में हर व्यक्ति समान सम्मान पाएगा?
और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न…
*क्या इस बार “कोठरी संस्कृति” समाप्त होगी?*
वर्षों से देखने में आता है कि कुछ स्थानों पर पूज्य साधु-साध्वियों तक पहुँच भी कुछ लोगों की जागीर बन जाती है। सामान्य श्रावक-श्राविकाएँ घंटों प्रतीक्षा करते हैं, जबकि कुछ विशेष लोगों के लिए हर समय द्वार खुले रहते हैं। संतों के चारों ओर ऐसा घेरा बना दिया जाता है कि भाववंदना भी अनुमति से होने लगे। यदि संत समाज के हैं, तो उन तक पहुँच भी समाज की होनी चाहिए, किसी समूह की नहीं।
चातुर्मास आत्मसंयम, आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का पर्व है। यदि चार माह बाद भी समाज पहले की तरह गुटों में बँटा रहे, प्रतिष्ठा की होड़ जारी रहे, गरीब और अमीर का अंतर बना रहे और धर्म केवल मंचों, स्वागतों, प्रभावनाओं तथा फोटो तक सीमित रह जाए, तो इतने विशाल आध्यात्मिक संगम का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
इंदौर को इस वर्ष एक दुर्लभ अवसर मिला है। 50 चातुर्मास स्थल केवल आयोजन केंद्र नहीं, बल्कि 50 सामाजिक परिवर्तन केंद्र बन सकते हैं। यदि प्रत्येक स्थल एक सेवा प्रकल्प, एक शिक्षा अभियान, एक पर्यावरण संकल्प और एक सामाजिक समरसता का संदेश दे, तो यह चातुर्मास इतिहास बन जाएगा।
अन्यथा चार माह बाद फिर वही चर्चा होगी
“किसका स्वामी वात्सल्य सबसे अच्छा था, किसकी प्रभावना सबसे महंगी थी, किस मंच पर सबसे बड़े वीवीआईपी आए थे और किस समिति ने सबसे अधिक वाहवाही लूटी।”
धर्म की असली विजय तब होगी, जब चातुर्मास के अंत में समाज यह कह सके
“हमने केवल प्रवचन नहीं सुने, हमने अपने भीतर भी परिवर्तन किया।”






