*तो फिर इसे क्या कहें !-अन्ना दुराई*

*तो फिर इसे क्या कहें !*

*-अन्ना दुराई*

वर्तमान दौर में यह कहावत अब निरर्थक लगती है कि बोलने वालों के चने बिकते हैं। आजकल मौन ने वो सारी ताकत हासिल कर ली है जो हर स्थिति परिस्थिति, गलत से गलत में भी गढ़ जीतने का हथियार बनकर उभरी है। एक समय रहा जब सियासतदार अपनी ओजस्वी वाणी, बोलने की क्षमता, वाक मुखरता, कुशल वक्ता के बतौर जाने जाते। मुद्दों के पक्ष विपक्ष में तर्कसंगत बात रखते। इसी के आधार पर वे जनता के प्रिय बनते। उनके दिलों में अपना स्थान बनाते लेकिन आजकल एक नया ही मंजर नजर आ रहा है। सत्ता के शिखर पर बैठे शीर्ष नेतृत्व ने कई मुद्दों पर मौन अख़्तियार कर लेने का सिलसिला शुरू कर दिया है। ऐसे वक्त जब आम नागरिक जनहित से जुड़े मुद्दों पर आधिकारिक रूप से कुछ जानना चाहती हो, उसे निराशा ही हाथ लगती है। बस अब सूत्र चलते हैं। जिसमें सही गलत, सच झूठ के कोई मायने नहीं होते। कयास ही कयास लगते रहते हैं। सुनी सुनाई बातों पर जुबानी जमा खर्च होता रहता है। रही सही कसर, वाट्सएप यूनिवर्सिटी पूरी कर देती है। जनता के दिलों दिमाग़ से खेलने की इस प्रवृत्ति ने खासा प्रभावित किया है। होने वाले इस नुकसान की भरपाई असंभव सी लगती है। गलत को सही, झूठ को सच साबित करने का क्रम निरंतर चलता है। इसमें वो लोग ज्यादा शामिल रहते हैं जिनका राजनीति से कोई लेना देना नहीं। अर्थनीति के चलते वे सत्ता पक्ष से जुड़े रहते हैं। अनर्गल दुष्प्रचार के माध्यम से सभी को बरगलाने में लगे रहते हैं।

बात नीति और नियत की है। जो अर्थ का अनर्थ करने में जाया हो रही है। अपने कृत्यों को सही ठहराने के लिए झूठ पर झूठ प्रचारित करना कहीं से कहीं तक उचित प्रतीत नहीं होता। अच्छा हो, कुछ गलत हो जाए तो उसे स्वीकारने में कोई कोताही नहीं होना चाहिए। सौ झूठ पर एक सच्चाई को मानते हुए, उसे सुधार लेना ज्यादा असरकारक हो सकता है। सत्ता पक्ष आज भी परीक्षा पेपर लीक, पेट्रोल में इथेनॉल, श्रीराम मंदिर में दान चोरी जैसे आदि अनेक मुद्दों पर मौन धारण किए हुए है। जन जन की आस्था को आहत कर उसे घर का मामला बताना, धर्म के नाम पर हो रहे पाखंड को ढकना ठीक वैसा है जैसे कोई किसी परिजन का मर्डर कर दे और बचाव में कहे या कहलवाए कि यह तो परिवार का मामला है। कायदे से आस्था के नाम पर ढोंग धतूरापन बर्दाश्त से बाहर होना चाहिए। किसी भी तरह का अपराध करने वाला शख्स यदि अपनी जाति के नाम पर बचने की उम्मीद रखने लगा तो सोचना होगा, हम किस दिशा में जा रहे हैं।

इन दिनों अक्सर जिहाद शब्द का प्रयोग देखने को मिलता है। ये जिहाद, वो जिहाद। जो एक खास वर्ग के लिए प्रयोग में लाया जाता है। क्या सही क्या गलत, लेकिन यदि ऐसा है तो फिर शासन प्रशासन में होने वाले भ्रष्टाचार के लिए रंगदारी जिहाद, पेपर लीक करने वालों के लिए शैक्षणिक जिहाद, मंदिर में चंदा और दान चोरी करने वालों के लिए धर्म जिहाद, भारी भरकम टैक्स के लिए वसूली जिहाद, दल बदल पर हार्स ट्रेडिंग जिहाद सहित डॉन, माफिया, फलां कनेक्शन, अंडरवर्ल्ड आदि शब्दों के प्रयोग से परहेज नहीं होना चाहिए। शासन प्रशासन के स्तर पर जो जिहाद हो रहे हैं, आज जरूरत तो उससे निपटने एवं सत्य की राह दिखाने की भी है।

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