काले मेघा, काले मेघा पानी तो बरसाओ -ऋषि पांडे

काले मेघा, काले मेघा पानी तो बरसाओ..

-ऋषि पांडे

एक दिन बाद जून भी बिदा ले लेगा,लेकिन आँखे मानसून के इंतज़ार में आसमान पर टकटकी लगाए बैठी है…आसमान में मानसूनी बादल खोजे नहीं मिल रहे और तपिश ऐसी है कि कमरों से निकलना भारी है…क्या वाकई यह सिर्फ मौसम का लेट होनाहै, या हम सबने मिलकर कुछ बहुत बड़ा बिगाड़ लिया है…आम तौर पर जून के दूसरे तीसरे हफ्ते तक मानसून की पहली बौछारें तन और मन दोनों को तर कर देती थीं…मिट्टी की सोंधी खुशबू आती थी और एक राहत मिलती थी…रसोई से कच्चे आम के अचार बनने की ख़ुशबू आने लगती थी… बौराये हुए आम की चुनिंदा किस्में ही बाजार में महकती थीं…लेकिन आज देश का एक बड़ा हिस्सा बूंद-बूंद पानी और भीषण लू से कराह रहा है…
अक्सर अखबारों और टीवी पर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ या ‘क्लाइमेट चेंज’ जैसे बड़े-बड़े शब्द सुनते हैं…लेकिन सच तो यह है कि यह संकट हमारे अपने लालच का नतीजा है…विकास के नाम पर हमने धड़ाधड़ पेड़ काटे..सड़क बनने के नाम पर हजारों पेड़ो की बलि देते वक्त हुक्मरानों के हाथ नहीं काँपते..नदियों और तालाबों को पाटकर कालोनियां तान दी…घर घर एसी हर रूम एसी की होड़ ने यह भूला दिया कि बाहर की दुनिया को हम कितना झुलसा रहे हैं…
अजीब विरोधाभास है ,एक तरफ देश का मध्य और पश्चिमी हिस्सा इस जानलेवा गर्मी और सूखे की मार झेल रहा है, तो दूसरी तरफ पूर्वोत्तर के राज्यों में बाढ़ तबाही मचा रही है, पुल ढह रहे हैं… याद रखिए, कुदरत जब थप्पड़ मारती है, तो उसमें आवाज नहीं होती, सिर्फ तबाही होती है…

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