*नाकारा नहीं बनाएं लायक !*
*-अन्ना दुराई*
अब समय आ गया है। एक अच्छे खासे वर्ग को भी अपनी झिझक छोड़नी होगी। शर्म और संकोच को ताक पर रखना होगा। भंडारे में बंटने वाली पुड़ी को लाईन में लगकर लेने की आदत डालना होगी। चौराहे चौराहे पर वितरित होने वाले प्रसाद को अपने हाथ में समेटने का कौशल सीखना होगा। आने वाली सूचनाओं के आधार पर रोज कहीं न कहीं मुफ्त भोजन का लाभ लेने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा। पांच किलो मुफ्त राशन की सूची में अपना नाम दर्ज कराने में कसमसाते मन को मजबूत करना होगा। यहां वहां मिलने वाली सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए हाथ फैलाने की जुगत भिड़ाना होगी। आर्थिक बदहाली का यह मंजर देश की जनता को कहां ले जाकर छोड़ेगा, पता नहीं। जो स्थितियां सामने हैं, वो मजबूरी का सबब बनेगी। मरता क्या नहीं करता की तर्ज पर अधिसंख्य लोगों को अपनी गुजर बसर के लिए लाचारी ओढ़ना होगी।
जिस देश में कर्म की बजाय सभी को धर्म में उलझाकर रखा जाए, वहां ऐसे हालात तो बनने ही है। वाकई समझ नहीं आता हमारे देश में इतना धर्म हो रहा है, यह जाता कहां है। धर्म निजी आस्था का प्रतीक है। हर व्यक्ति अपने अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र है। सरकार को तो अपने नागरिकों को कर्म प्रधान बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए लेकिन अपनी कमियों को छिपाने के लिए आजकल नेतागण धर्मगिरी में लगे रहते हैं और जनता को भी उसमें व्यस्त रखते हैं। एक समय था जब तप तपकर नेता बनते। जनसेवा के कार्य देखकर उनका आकलन होता लेकिन आज जप जपकर होर्डिंग्स एवं इश्तेहार के माध्यम से स्वयं को नेता बताना पड़ता है। मानों कोई फ्रेंचाइजी उन्हें मिली हो। लाखों रुपए खर्च करके खुद को जनसेवक साबित करने की यह कोशिश इस सच्चाई को उजागर करती है कि इस तरह के लोगों का राजनीति में आने का उद्देश्य क्या है। वैचारिक प्रतिबद्धता से कुछ लेना देना नहीं। बस अपनी आर्थिक सुदृढ़ता के लिए सदैव तत्पर। अपनी ताकत दिखाने के लिए ये कुछ भी कर गुजरते हैं। हाल ही में कुत्तों को लेकर सत्ताधारी दल और उनसे जुड़े संगठन ने अपने अपने रूतबे के लिए जो हिंसक ताकत दिखाई। मिनटों में सैकड़ों की संख्या में जुट जाना। पुलिस प्रशासन जेब में। न कोई डर न कोई भय। सोचता हूँ आम जनता की जायज समस्याओं के समाधान के लिए तो ये कभी आतुर नहीं दिखते।
सत्ता पक्ष भले ही 12 वर्षों के अपने कार्यकाल और योजनाओं का बखान करे लेकिन आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन यापन में कोई 12 भी लाभकारी परिवर्तन आए हों, यह दिखता नहीं। इस कठिन दौर में जहां आम आदमी दर दर की ठोकर खाने के लिए मजबूर हो, सरकारी फ़िज़ूलख़र्ची में कोई कमी प्रतीत नहीं होती तो सभी के मन में सवाल तो उठते ही हैं। प्रत्येक राजनीतिक दल को, जो हमने किया या कर दिया, वो अंतिम सत्य मान लेने का घमंड और अहंकार एक दिन कब राम नाम सत्य की कगार पर ला खड़ा करेगा, इसका भय तो होना ही चाहिए। इसलिए आम जनता के हितों के प्रति सजग बनना होगा। नागरिकों को नाकारा बनाने की बजाय उन्हें लायक बनाना होगा। देश की प्रगति भी वास्तविक धरातल पर तभी नजर आएगी।
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