डेली कॉलेज पर हाईकोर्ट का शिकंजा: चुनावी गड़बड़ियों की जांच के आदेश, नया बोर्ड नीतिगत फैसले लेने से रोका गया
नामांकन निरस्त कर प्रत्याशी को चुनाव से बाहर करने, कथित बैक-डेटेड गाइडलाइंस और चुनावी अनियमितताओं पर हाईकोर्ट सख्त; साइबर पुलिस और रजिस्ट्रार को 15 दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश
इंदौर, 29 मई। देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में शामिल डेली कॉलेज, इंदौर की चुनावी प्रक्रिया अब गंभीर न्यायिक जांच के घेरे में आ गई है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने डेली कॉलेज सोसायटी के हालिया बोर्ड ऑफ गवर्नर्स चुनावों में कथित अनियमितताओं, चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप, चुनावी दस्तावेजों की कथित बैक-डेटिंग तथा साइबर स्तर पर रिकॉर्ड्स से छेड़छाड़ के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने न केवल साइबर क्राइम पुलिस, इंदौर को जांच सौंपी है, बल्कि फर्म्स एवं सोसायटीज विभाग के सक्षम प्राधिकारी को भी सभी आरोपों की विस्तृत जांच कर दस्तावेजी साक्ष्यों सहित रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि न्यायालय ने नव-निर्वाचित बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को अगली सुनवाई तक कोई भी नीतिगत/पालिसी निर्णय लेने से रोक दिया है।
यह आदेश संस्थापक दाता (Founder Donors) श्रेणी के सदस्य श्री नरेंद्र सिंह बिड़वाल द्वारा दायर याचिका पर पारित किया गया। याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता वीर कुमार जैन एवं अधिवक्ता पीयूष पाराशर ने की।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि नरेंद्र सिंह बिड़वाल का नामांकन पत्र चुनाव अधिकारी द्वारा ऐसे आधारों पर निरस्त कर दिया गया, जिनका न तो सोसायटी के उपविधियों में कोई उल्लेख था और न ही चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के समय कोई वैध अस्तित्व था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उनके नामांकन को अवैध रूप से निरस्त कर उन्हें चुनावी मैदान से बाहर किया गया, जिससे संस्थापक दाता श्रेणी में केवल दो उम्मीदवार – राजा प्रियव्रत सिंह खींची और विक्रम सिंह पंवार (देवास) — ही मैदान में बचे और दोनों निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो गए।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस प्रश्न को गंभीर माना कि 21 अप्रैल 2026 को चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद चुनाव अधिकारी को नई चुनावी गाइडलाइंस जारी करने अथवा संशोधित उपविधियों को लागू करने का अधिकार तक था या नहीं। न्यायालय ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों का अवलोकन करने के बाद स्पष्ट रूप से कहा कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों में पर्याप्त बल प्रतीत होता है। इतना ही नहीं, न्यायालय ने डेली कॉलेज की ओर से प्रस्तुत बचाव को भी इस स्तर पर स्वीकार नहीं किया एवं न्यायालय के आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया कि न्यायालय “चुनाव अधिकारी” की ऐसी शक्तियों के संबंध में प्रस्तुत स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं है।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा पहले से की गई शिकायतों को भी गंभीरता से लिया। नरेंद्र सिंह बिड़वाल ने 4 मई 2026 को साइबर क्राइम पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया था कि चुनावी प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड्स में छेड़छाड़ की गई है तथा जिन चुनावी गाइडलाइंस के आधार पर उनका नामांकन निरस्त किया गया, वे वास्तव में बाद में वेबसाइट पर अपलोड की गईं, जबकि उन पर पूर्व की तारीख अंकित की गई थी। इसी प्रकार फर्म्स एवं सोसायटीज विभाग के समक्ष भी विस्तृत शिकायतें प्रस्तुत की गई थीं। हाईकोर्ट ने इन शिकायतों को नजरअंदाज करने के बजाय सीधे जांच के आदेश जारी कर दिए। न्यायालय ने साइबर क्राइम पुलिस को निर्देश दिया है कि वह सभी आरोपों की जांच कर अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे। साथ ही रजिस्ट्रार/संबंधित प्राधिकारी को भी निर्देशित किया गया है कि वह सभी पक्षों को सुनकर विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश डेली कॉलेज प्रबंधन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि सामान्यतः चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद न्यायालय हस्तक्षेप से बचते हैं। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठाए गए प्रश्नों को इतना गंभीर पाया कि उसने दो स्वतंत्र एजेंसियों को जांच के आदेश दिए तथा नव-निर्वाचित बोर्ड की शक्तियों पर भी तत्काल प्रभाव से अंकुश लगा दिया।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि डेली कॉलेज में पिछले कई महीनों से चुनावी प्रक्रिया विवादों में रही है। बोर्ड के कार्यकाल विस्तार, चुनाव कार्यक्रम की वैधता, हजारों “ओल्ड डेलियंस” (पूर्व छात्रों) के मतदान अधिकारों को समाप्त किए जाने, चुनाव अधिकारी द्वारा कथित रूप से अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नियम बनाने, उपविधियों में संशोधनों की वैधता तथा चुनावी गाइडलाइंस के कथित विलंबित प्रकाशन जैसे अनेक मुद्दे लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं।
अब हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इन सभी घटनाक्रमों पर न्यायिक निगरानी में जांच होने जा रही है। न्यायालय के आदेश के बाद डेली कॉलेज की चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह जांच के दायरे में आ गई है और आने वाली रिपोर्टें यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी कि चुनावों के दौरान उठाए गए गंभीर आरोपों में कितनी सच्चाई है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि हाईकोर्ट ने डेली कॉलेज चुनाव विवाद को साधारण आंतरिक चुनावी विवाद मानने से इंकार कर दिया है। साइबर जांच, वैधानिक जांच और नव-निर्वाचित बोर्ड के नीतिगत अधिकारों पर रोक जैसे आदेश यह संकेत देते हैं कि न्यायालय चुनाव प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को अत्यंत गंभीरता से देख रहा है। अब पूरे मामले पर प्रदेशभर की निगाहें टिकी हुई हैं और डेली कॉलेज की चुनावी प्रक्रिया अभूतपूर्व न्यायिक जांच के दौर में प्रवेश कर चुकी है।
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