एनटीए के पतन से टूटा भरोसा
12 मई 2026 को राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने नीट (यूजी) 2026 परीक्षा रद्द कर दी गई. 3 मई को देशभर में 22.79 लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी, लेकिन राजस्थान के सीकर में एक ‘गेस पेपर’ सामने आया जिसमें 135 सवाल असली पेपर से मैच कर गए. व्हाट्सएप-टेलीग्राम पर घूमे 410 सवालों वाले इस पेपर को कोचिंग माफिया ने लाखों रुपये में बेचा. परीक्षा को आयोजित करने वाली एनटीए ने स्वीकार किया कि परीक्षा प्रक्रिया पर भरोसा नहीं बचा, इसलिए री-एग्जाम होगा.
यह पहली बार नहीं है. 2018 से एनटीए ने 14 बड़ी परीक्षाएं कराईं, जिनमें से कम से कम छह में पेपर लीक या अन्य तरह के गड़बड़ी के आरोप लगे है. नीट का पेपर तीन साल में दूसरी बार लीक हुआ है. छात्रों का भरोसा टूट चुका है. लेकिन सवाल यही है कि जिस एनटीए का गठन 2017 में परीक्षाओं को निष्पक्ष, पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाने के लिए हुआ था, वह इतना पिट क्यों गया? और क्या इसे खत्म करके ही नीट जैसी देश की सबसे बड़ी परीक्षाओं पेपर लीक से बचाया जा सकता है? एनटीए की स्थापना का उद्देश्य सराहनीय था. 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति और 1992 में राष्ट्रीय स्तर पर एक परीक्षा एजेंसी बनाने की बात हुई थी. 2010 में आईआईटी निदेशकों की समिति ने संसद के अधिनियम से स्वायत्त संस्था बनाने की सिफारिश की. अमेरिका के ईटीएस मॉडल पर बनी यह एजेंसी सीबीएसई, राज्य बोर्डों और अलग-अलग एजेंसियों के बोझ को कम करके छात्रों पर तनाव घटाना चाहती थी. जेईई मेन्स, नीट-यूजी, यूजीसी नेट जैसी परीक्षाएं एक छत के नीचे हो जाएंगी, तो नकल, भ्रष्टाचार और अनियमितताएं रुक जाएंगी. लेकिन सात साल बाद वही एजेंसी आज सबसे बड़े संकट का प्रतीक बन गई है.कारण गहरे हैं. सबसे बड़ा कारण है कि एक एजेंसी पर अत्यधिक निर्भरता.
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एक संस्था साल भर में कई हाई-स्टेक परीक्षाएं कराती है तो प्रशासनिक थकान, समन्वय की कमी, साइबर सिक्युरिटी जैसी समस्याएं और आउटसोर्सिंग से जुड़ी अनियमितताएं जन्म लेती हैं. यूपीएससी 100 केंद्रों पर परीक्षा लेता है, जबकि नीट 10,000 केंद्रों पर सेंटर बनाता है. इतने बड़े स्केल में सिस्टम कई जगहों से टूट सकता है. प्रिंटिंग प्रेस से लीक, कोचिंग हब (सीकर जैसा ‘मिनी कोटा’) में माफिया, बायोमेट्रिक-सीसीटीवी के बावजूद फेल सुरक्षा प्रोटोकॉल और राजनीतिक दबाव – सब मिलकर एनटीए को कमजोर कर रहे हैं.
सवाल उठता है कि क्या एनटीए को खत्म कर देना ही अब समाधान बचा है? इसका जवाब नहीं हो सकता है. पर सोचने वाली बात यह है कि जिस संस्था जन्म जिस समस्या को खत्म करने के लिए हुआ था अगर उसके चलते समस्या पहले से अधिक बढ़ जाए तो फिर उस संस्था के बने रहने का मतलब क्या रह जाता है. किसी भी संस्था को अपने को साबित करने के लिए 7 साल का समय कम नहीं होता है. छात्रों का भविष्य दांव पर है. 22 लाख युवा एक बार फिर अनिश्चितता में हैं. नीट रद्द होने से उनकी तैयारी, समय और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा है. परीक्षा सुधार के लिए बनी एजेंसी को अगर परीक्षा का सबसे बड़ा खतरा बन जाना पड़े तो यह लोकतंत्र और शिक्षा दोनों के लिए चेतावनी है.
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