*महासंघ न्यास में उठे सवाल: गैर-निर्वाचित दखल से अटका समन्वय, समाज हित पर भारी पड़ रही सलाहकारी राजनीति*
इंदौर। महावीर जन्म कल्याणक दिवस पर श्री नाकोड़ा जैन कॉन्फ्रेंस द्वारा आयोजित नवकारसी कार्यक्रम में इवेंट कंपनी के ट्रैक्टर बाधित विवाद को लेकर अब श्वेतांबर जैन महासंघ न्यास के भीतर भी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार महासंघ न्यास के करीब दस सदस्यों ने आपसी चर्चा के बाद सर्वानुमति से यह मत रखा है कि समाज को गैर-निर्वाचित पदाधिकारियों की सलाह और प्रभाव के आधार पर चलाना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे समाज की परंपरागत समन्वय व्यवस्था भी कमजोर हो रही है।
सूत्रों के अनुसार न्यास सदस्यों ने स्पष्ट माना कि जब संबंधित इवेंट कंपनी अपनी त्रुटि स्वीकार कर लिखित रूप से जवाबदेही स्वीकार कर चुकी है, तब विवाद को लंबा खींचने के बजाय समाज के वरिष्ठजनों, आयोजकों और महासंघ नेतृत्व के बीच समन्वय बैठक कर समाधान निकालना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। आरोप है कि महासंघ नेतृत्व के आसपास सक्रिय गैर-निर्वाचित पदाधिकारियों और सलाहकार भूमिका निभाने वाले कुछ व्यक्तियों ने आपसी संवाद की जाजम बैठक होने ही नहीं दी, जिससे विवाद का समाधान टलता गया और समाज में अनावश्यक कटुता बढ़ी।
न्यास से जुड़े सदस्यों का मानना है कि समाज संवाद, समन्वय और परस्पर सम्मान की परंपरा से चलता है, न कि बंद कमरों में तय होने वाली सलाहकारी राजनीति से। समाज की स्वस्थ परंपरा हमेशा यह रही है कि विवाद उत्पन्न होने पर अग्रज, न्यासी, आयोजक और समाज प्रतिनिधि बैठकर समाधान निकालते रहे हैं। किंतु इस प्रकरण में समन्वय की वही परंपरा सबसे पहले बाधित हुई।
जानकारों का कहना है कि इस पूरे विवाद में महासंघ नेतृत्व का रुख जितना कठोर और मौनपूर्ण रहा, उससे अधिक चिंता का विषय गैर-निर्वाचित पदाधिकारियों का बढ़ता हस्तक्षेप बन गया। यह हस्तक्षेप केवल निर्णय प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संवाद की संभावनाओं को भी प्रभावित करता दिखा। समाज में यह प्रश्न अब गंभीरता से उठने लगा है कि यदि निर्णय निर्वाचित नेतृत्व को लेना है, तो फिर गैर-निर्वाचित प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका इतनी निर्णायक क्यों होती जा रही है?
समाजजनों का मानना है कि यदि नेतृत्व वास्तव में समाजहित को प्राथमिकता देता, तो त्रुटि स्वीकारोक्ति के बाद विवाद को प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाकर समन्वय का विषय बनाया जाता। परंतु जिस प्रकार समाधान की बजाय मौन, दूरी और परोक्ष सलाहों ने स्थान लिया, उसने यह संकेत अवश्य दिया है कि समाज के भीतर संवाद से अधिक प्रभाव-तंत्र को महत्व दिया जा रहा है।
अब समाज के भीतर यह स्वर मुखर होने लगा है कि महासंघ न्यास को स्पष्ट करना होगा कि समाज संविधान, निर्वाचित नेतृत्व और सामूहिक सहमति से चलेगा या फिर गैर-निर्वाचित सलाहकारों की छाया से। क्योंकि जहां संवाद रुकता है, वहीं से अविश्वास जन्म लेता है और जहां समन्वय टूटता है, वहीं से समाज कमजोर होना शुरू होता है।






