ग्वालियर–चंबल की राजनीति में बदलता संतुलन
सीमित होता सिंधिया प्रभाव, सक्रिय जयवर्धन सिंह और 2028 की निर्णायक तैयारी
मध्यप्रदेश की राजनीति में ग्वालियर–चंबल अंचल हमेशा से सत्ता की दिशा तय करने वाला क्षेत्र रहा है। 34 विधानसभा सीटों वाला यह इलाका केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी राज्य की सरकार बनाने या गिराने की क्षमता रखता है। पिछले एक दशक में इस क्षेत्र ने जितने राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं, उतने शायद ही किसी अन्य क्षेत्र ने देखे हों।
2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत, 2020 का दलबदल और उपचुनाव, तथा 2023 के चुनावों का जटिल परिणाम—इन तीनों घटनाओं ने ग्वालियर-चंबल की राजनीति का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया। आज यह क्षेत्र एक नए राजनीतिक संतुलन की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है, जहाँ एक तरफ ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव पहले जैसा सर्वव्यापी नहीं रहा, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में जयवर्धन सिंह लगातार सक्रिय और रणनीतिक नेतृत्व के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं।
2018 के विधानसभा चुनाव ग्वालियर-चंबल के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ थे। उस समय कांग्रेस ने इस क्षेत्र की 34 में से 26 सीटें जीतकर भाजपा के लंबे प्रभुत्व को चुनौती दे दी थी। ग्वालियर, मुरैना, भिंड, शिवपुरी, गुना और अशोकनगर जैसे जिलों में कांग्रेस की लहर दिखाई दी। उस समय कांग्रेस की जीत के पीछे कई कारण थे—भाजपा के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी, जातीय समीकरणों में बदलाव और स्थानीय नेताओं की मजबूत पकड़।
लेकिन मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने से पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल गया। उनके साथ कई कांग्रेस विधायक भाजपा में चले गए और मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार गिर गई। इसके बाद हुए उपचुनावों में भाजपा ने कुछ सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की, लेकिन कांग्रेस ने भी कई सीटों पर अपनी पकड़ बनाए रखी।
2023 के विधानसभा चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया कि ग्वालियर-चंबल अब किसी एक नेता या परिवार का पूरी तरह नियंत्रित क्षेत्र नहीं रहा। भाजपा ने 19 सीटें जीतीं और कांग्रेस ने 15 सीटें हासिल कीं। यह परिणाम यह दिखाने के लिए काफी था कि मुकाबला अब लगभग बराबरी का है और हर सीट पर स्थानीय समीकरण निर्णायक बन चुके हैं।
2023 के चुनावों का एक बड़ा संदेश यह भी था कि सिंधिया के कई करीबी नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। डबरा में इमरती देवी, बमोरी में महेंद्र सिंह सिसोदिया और पोहरी में सुरेश राठखेड़ा की हार ने यह संकेत दिया कि भाजपा के भीतर सिंधिया समर्थकों की स्थिति उतनी मजबूत नहीं रह गई है जितनी 2020 के बाद मानी जा रही थी।
दूसरी ओर कांग्रेस के अंदर एक नया राजनीतिक केंद्र बनता दिखाई दे रहा है—राघोगढ़ से विधायक जयवर्धन सिंह। युवा नेतृत्व, संगठन के साथ मजबूत संबंध और लगातार क्षेत्रीय सक्रियता ने उन्हें ग्वालियर-चंबल में कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया है।
जयवर्धन सिंह का प्रभाव विशेष रूप से गुना, शिवपुरी और अशोकनगर जिलों में तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। राघोगढ़ सीट पर लगातार मजबूत प्रदर्शन और क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं से उनका सीधा संवाद उन्हें कांग्रेस की आगामी रणनीति का केंद्र बना रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2028 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ग्वालियर-चंबल में नई रणनीति के साथ उतर सकती है। इसमें संगठन को मजबूत करना, युवाओं को टिकट देना और स्थानीय मुद्दों को चुनाव का केंद्र बनाना शामिल हो सकता है।
विशेष रूप से गुना, शिवपुरी और अशोकनगर जिलों में कांग्रेस की रणनीति काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
गुना जिले में चार विधानसभा सीटें हैं—राघोगढ़, बमोरी, गुना और चाचौड़ा। इनमें से राघोगढ़ कांग्रेस का मजबूत गढ़ है। बमोरी में कांग्रेस की मजबूत वापसी हुई है और चाचौड़ा में भी भाजपा को कड़ी चुनौती मिल रही है। यदि कांग्रेस इन चार में से तीन सीटें जीतने में सफल होती है, तो यह क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है।
अशोकनगर जिले में तीन विधानसभा सीटें हैं—अशोकनगर, चंदेरी और मुंगावली। 2018 में कांग्रेस ने तीनों सीटें जीती थीं और आज भी यहाँ कांग्रेस का मजबूत संगठन मौजूद है।
चंदेरी और मुंगावली की राजनीति विशेष रूप से दिलचस्प है। यहाँ स्थानीय नेताओं की व्यक्तिगत पकड़ बहुत महत्वपूर्ण होती है। यदि कांग्रेस संगठनात्मक रूप से मजबूत अभियान चलाती है तो इन सीटों पर फिर से वापसी की संभावना मजबूत मानी जाती है।
शिवपुरी जिले में चार सीटें हैं—शिवपुरी, करैरा, पिछोर और कोलारस। यह जिला लंबे समय तक सिंधिया परिवार का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन अब भाजपा के अंदर भी नए नेतृत्व की मांग बढ़ रही है।
राजनीतिक चर्चा यह भी है कि भविष्य में भाजपा यहाँ टिकट वितरण में सिंधिया की भूमिका को सीमित कर सकती है। संभव है कि कोलारस जैसी सीट पर ही सिंधिया गुट को प्राथमिकता मिले, जबकि शिवपुरी, करैरा और पिछोर में भाजपा संगठन अपने उम्मीदवार उतारे।
इस बदलते राजनीतिक समीकरण का सीधा लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। यदि कांग्रेस शिवपुरी जिले में दो या तीन सीटें जीतने में सफल होती है तो यह पूरे ग्वालियर-चंबल की राजनीति का संतुलन बदल सकता है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू लाडली बहना योजना का प्रभाव है। 2023 के चुनावों में इस योजना को भाजपा की बड़ी रणनीति माना गया। लेकिन समय के साथ-साथ इस योजना का राजनीतिक प्रभाव कम होने की संभावना भी जताई जा रही है।
यदि 2028 तक बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं से जुड़े मुद्दे अधिक प्रमुख हो जाते हैं, तो ग्वालियर-चंबल जैसे क्षेत्रों में चुनावी मुद्दे बदल सकते हैं।
कांग्रेस भी अब इन मुद्दों पर अपनी रणनीति बना रही है। अग्निपथ योजना, जातीय जनगणना, किसानों की आय और युवाओं की रोजगार समस्या जैसे मुद्दों को कांग्रेस भविष्य की राजनीति का केंद्र बनाने की कोशिश कर सकती है।
ग्वालियर-चंबल की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि अब जनता केवल बड़े नामों या राजपरिवारों के आधार पर मतदान नहीं कर रही। स्थानीय उपलब्धता, संगठनात्मक सक्रियता और जनता से सीधा संवाद अधिक महत्वपूर्ण बन गया है।
यही कारण है कि कई बड़े नेताओं को हार का सामना करना पड़ा और कई नए चेहरे उभरकर सामने आए।
आने वाले वर्षों में यदि कांग्रेस गुना, अशोकनगर और शिवपुरी जिलों में कुल मिलाकर 7 या 8 सीटें जीतने में सफल होती है, तो इसका असर केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भविष्य के लोकसभा चुनावों में भी मुकाबला बेहद कड़ा हो सकता है।
कुल मिलाकर ग्वालियर-चंबल की राजनीति एक नए संक्रमण काल से गुजर रही है। सिंधिया का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन वह पहले जैसा निर्णायक भी नहीं रह गया है।
दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर जयवर्धन सिंह जैसे युवा नेताओं की सक्रियता संगठन को नई दिशा दे रही है।
2028 का चुनाव इस क्षेत्र के लिए केवल एक सामान्य चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि ग्वालियर-चंबल की राजनीति का केंद्र आगे भी “महल” रहेगा या फिर पूरी तरह “संगठन और जनता” के हाथों में चला जाएगा।
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