*महासंघ या महज़ नामपट्टिका? श्वेतांबर जैन समाज को स्पष्ट दिशा चाहिए*
श्वेतांबर जैन समाज के भीतर बढ़ती गुटबाजी अब फुसफुसाहट का विषय नहीं रही; यह खुली चिंता बन चुकी है। प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस संगठनात्मक सोच का है जो समाज को एकसूत्र में पिरोने के बजाय खांचों में बांट रही है। जब हम स्वयं को भगवान महावीर का अनुयायी कहते हैं, तब हमें यह भी तय करना होगा कि क्या हमारा आचरण उनकी समता, संयम और समन्वय की शिक्षाओं के अनुरूप है?
आज आवश्यकता आत्ममंथन से आगे बढ़कर आत्मसुधार की है। यदि महासंघ केवल कुछ प्रभावशाली और पूंजीसंपन्न लोगों की प्रतिष्ठा बढ़ाने का मंच बनकर रह जाए, तो वह “समग्र समाज” का प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता। समाज की असली ताकत उसके सर्वश्रावक-श्राविकाओं, विभिन्न संघों, कालोनियों और युवा समूहों में निहित है। उन्हें निर्णय प्रक्रिया से दूर रखकर एकता का दावा करना यथार्थ से आंख मूंदने जैसा है।
धार्मिक नेतृत्व की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। विभिन्न गच्छों के गच्छाधिपति, आचार्य और साधु-साध्वी भगवंत यदि एक साझा संवाद मंच पर बैठें, तो वह संदेश संगठनात्मक स्तर पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगा। आध्यात्मिक दिशा के बिना संगठनात्मक एकता टिकाऊ नहीं हो सकती।
यह भी कटु सत्य है कि यदि महासंघ की सक्रियता केवल महावीर जन्म कल्याणक जैसे आयोजनों तक सीमित रह जाए। जहां राजनीतिक हस्तियों की उपस्थिति और औपचारिक झंडी दिखाने के दृश्य प्रमुख हों, तो यह समाज की अपेक्षाओं के साथ न्याय नहीं है। आयोजन आवश्यक हैं, परंतु उससे अधिक आवश्यक है शिक्षा, संस्कार, युवा सहभागिता, पारदर्शिता और सर्वसमावेशी नीति।
सबसे बड़ी चिंता युवा पीढ़ी को लेकर है। जब उन्हें समाज के भीतर समन्वय के बजाय संघर्ष दिखाई देता है, तो वे दूरी बना लेते हैं। यदि यही प्रवृत्ति बनी रही, तो भविष्य की पीढ़ी समाज से भावनात्मक रूप से कट सकती है।
महासंघ नेतृत्व को अब स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करना चाहिए ।सर्वसमावेशी प्रतिनिधित्व, वित्तीय पारदर्शिता, नियमित संवाद और ठोस सामाजिक कार्यक्रमों के साथ। पद की गरिमा तभी सार्थक है जब वह समाज की एकता और उत्थान का माध्यम बने, न कि व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का उपकरण।
समय अभी भी हाथ में है। यदि नेतृत्व साहस दिखाए और समाज की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करे, तो वर्तमान संकट अवसर में बदल सकता है। अन्यथा, इतिहास यह दर्ज करेगा कि एकता का स्वर्णिम अवसर हमारे हाथों से फिसल गया।
*अक्षय जैन (नाकोड़ा)*






