*महावीर जन्मकल्याणक का बंटवारा क्यों?*
✒️*अक्षय जैन (नाकोड़ा)*
जैन समाज के आराध्य महावीर स्वामी का जन्मकल्याणक केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि अहिंसा, समता और एकता का वैश्विक संदेश है। यह वह पावन अवसर है जब पूरा जैन समाज प्रभु महावीर के आदर्शों को स्मरण कर आत्मचिंतन करता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस महापुरुष ने मानवता को जोड़ने का संदेश दिया, उसी के जन्मकल्याणक की तिथि को लेकर समाज में मतभेद की स्थिति खड़ी हो जाती है।
धार्मिक परंपरा और पंचांग की मूल व्यवस्था स्पष्ट कहती है कि धार्मिक पर्व उसी तिथि पर मनाया जाता है जिसका सूर्योदय होता है। इस वर्ष देशभर में प्रकाशित लगभग सभी कैलेंडरों और पंचांगों में 30 मार्च को चैत्र सुदी बारस और 31 मार्च को चैत्र सुदी तेरस अंकित है। जब भगवान महावीर का जन्मकल्याणक चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (चैत्र सुदी तेरस) पर माना जाता है, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि फिर इसे 30 मार्च को मनाने की जिद क्यों?
क्या हम अपनी ही धार्मिक परंपराओं की स्पष्ट व्यवस्था को नजरअंदाज कर समाज को भ्रमित करने की ओर बढ़ रहे हैं? तिथि का यह विवाद केवल कैलेंडर का अंतर नहीं, बल्कि समाज की एकता से जुड़ा विषय बन जाता है।
प्रभु महावीर ने अनेकांतवाद का सिद्धांत दिया मतभेद हो सकते हैं, परंतु सत्य के अनेक आयामों को स्वीकार करते हुए समाज को जोड़ना ही धर्म का मार्ग है। दुर्भाग्य से आज वही समाज अपने आराध्य के जन्मदिवस पर ही अलग-अलग दिन खड़ा दिखाई देता है। यह स्थिति न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी चिंताजनक है।
जैन समाज का यह महापर्व किसी एक पंथ, किसी एक संस्था या किसी एक नेतृत्व का निजी आयोजन नहीं है। यह पूरे जैन समाज की सामूहिक आस्था का उत्सव है। इसलिए इस विषय पर निर्णय भी ऐसा होना चाहिए जो समाज में भ्रम नहीं, बल्कि एकता का संदेश दे।
आज समय की मांग है कि समाज के सभी जिम्मेदार नेतृत्व, संत-साधु भगवंत और सामाजिक संगठन इस विषय पर व्यापक दृष्टि अपनाएं। तिथि की स्पष्टता के बावजूद यदि अलग-अलग दिन जन्मकल्याणक मनाने की परंपरा को बढ़ावा दिया जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने यह प्रश्न बार-बार खड़ा होगा कि आखिर एक ही महापुरुष के जन्मोत्सव की दो तिथियां क्यों?
इसलिए एक भावनात्मक और जिम्मेदार अपील है ,भगवान महावीर के जन्मकल्याणक का बंटवारा मत कीजिए।
जिस महापुरुष ने संसार को अहिंसा, करुणा और समभाव का मार्ग दिखाया, उनके जन्मोत्सव को भी उसी भावना से मनाइए। तिथि विवाद से ऊपर उठकर यदि पूरा जैन समाज एक दिन, एक स्वर में प्रभु महावीर को स्मरण करेगा, तभी यह पर्व वास्तव में अपने उद्देश्य को पूर्ण करेगा।
महावीर का संदेश स्पष्ट है विभाजन नहीं, समन्वय।
समाज यदि इस संदेश को समझ ले, तो जन्मकल्याणक केवल एक पर्व नहीं रहेगा, बल्कि जैन एकता का जीवंत प्रतीक बन जाएगा।






