*राजबाड़ा का ‘न्याय चक्र’ और रिमूवल विभाग की नई पटकथा*
इंदौर के ऐतिहासिक हृदय राजबाड़ा क्षेत्र में इन दिनों एक अनोखी फिल्म चल रही है। पटकथा भी तैयार, कलाकार भी तैयार और दर्शक तो बेचारे रोज़ के टिकटधारी हैं ही।
फर्क बस इतना है कि यह फिल्म सिनेमा हॉल में नहीं, सड़क और फुटपाथ पर रिलीज़ हो रही है और नाम है “न्याय चक्र”।
कहानी बड़ी रोचक है। जो लोग पिछले पाँच वर्षों से सड़क-फुटपाथ पर कब्जा जमाए बैठे माफियाओं के खिलाफ संघर्ष करते रहे, जनजागृति की मशाल जलाते रहे, वही अब “विरोधी पात्र” घोषित कर दिए गए। मानो रिमूवल विभाग की स्क्रिप्ट में एक नया ट्विस्ट आ गया हो ।
“जो अतिक्रमण हटाने की बात करेगा, वही खुद जांच के घेरे में आएगा।”
कहते हैं कि आर्थिक हितों पर चोट सबसे ज्यादा दर्द देती है। शायद यही वजह है कि जो लोग फुटपाथ मुक्त बाजार की मांग करते रहे, वे अब रिमूवल विभाग की आंखों में ऐसे चुभने लगे हैं जैसे साफ शीशे में पड़ा एक दाग। दाग छोटा हो या बड़ा, दिखता जरूर है।
रिमूवल विभाग की कार्यप्रणाली भी किसी फिल्मी क्लाइमेक्स से कम नहीं।
कभी अचानक दबिश, कभी चयनात्मक सख्ती, कभी मौन और कभी गरजना।
दर्शक सोच में पड़ जाते हैं ।
क्या यह जीरो टॉलरेंस है या जीरो ट्रांसपेरेंसी?
व्यापारी पूछ रहे हैं ।
अगर फुटपाथ मुक्त करने की आवाज उठाना अपराध है, तो फिर नागरिक जागरूकता का पुरस्कार क्या है?
क्या अब जनहित की बात करने से पहले “अनुमति पत्र” लेना पड़ेगा?
राजबाड़ा की गलियों में चर्चा है कि रिमूवल विभाग का न्याय चक्र कुछ ऐसा घूम रहा है जिसमें तीर हमेशा उसी दिशा में जाता है, जिधर से सवाल उठते हैं। मानो विभाग ने तय कर लिया हो
“सवाल पूछोगे, तो जवाब कार्रवाई में मिलेगा।”
विडंबना देखिए, जिनके खिलाफ वर्षों से शिकायतें थीं, वे अब भी आराम से धूप सेंक रहे हैं; और जो व्यवस्था सुधार की बात करते हैं, वे स्पष्टीकरण देते फिर रहे हैं। यह दृश्य किसी सामाजिक व्यंग्य से कम नहीं, बल्कि प्रशासनिक थ्रिलर की पूरी सीरीज़ बन सकता है।
जनता बस इतना जानना चाहती है
क्या न्याय चक्र सच में घूम रहा है, या फिर यह एक विशेष कोण पर अटका हुआ है?
राजबाड़ा की सड़कों पर चल रही इस “लाइव फिल्म” का अगला दृश्य क्या होगा, यह तो आने वाला समय बताएगा। पर इतना तय है कि जब जनजागृति को विरोध समझ लिया जाए, तब व्यंग्य खुद-ब-खुद जन्म ले लेता है।






