सोना–चांदी की चमक और सरकार की जिम्मेदारी* अक्षय जैन*
सोना और चांदी भारतीय अर्थव्यवस्था में केवल धातुएं नहीं, बल्कि भरोसे, परंपरा और निवेश का प्रतीक रहे हैं। लेकिन बीते कुछ समय से इनके बढ़ते भाव अब सिर्फ समृद्धि का संकेत नहीं, बल्कि चिंता की घंटी बनते जा रहे हैं। सवाल यह नहीं कि कीमतें क्यों बढ़ रही हैं, सवाल यह है कि इस बेकाबू होती चमक का खामियाजा आखिर कौन भुगत रहा है ,आम आदमी या सिर्फ बाजार?
वैश्विक अनिश्चितता, युद्ध, महंगाई और ब्याज दरों की उठापटक ने सोने-चांदी को एक बार फिर सुरक्षित निवेश का दर्जा दिला दिया है। वहीं देश के भीतर रुपये की कमजोरी, शेयर बाजार की अस्थिरता और पारंपरिक सोच ने मांग को और हवा दी है। यह सब स्वाभाविक कारण हैं। लेकिन इन कारणों की आड़ में अगर सट्टेबाजी, बड़े फंड्स की मुनाफाखोरी और अफवाहों का खेल कीमतों को जरूरत से ज्यादा ऊपर ले जाए, तो सरकार की चुप्पी सवालों के घेरे में आ जाती है।
कीमती धातुओं का बाजार पूरी तरह वैश्विक है, इसलिए सरकार के लिए सीधा मूल्य नियंत्रण न तो संभव है और न ही उचित। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि बाजार को बेलगाम छोड़ दिया जाए। जब आम परिवार के लिए शादी-ब्याह का सोना सपना बन जाए, छोटे ज्वेलर्स का कारोबार ठप होने लगे और निवेशक डर के माहौल में फैसले लेने को मजबूर हों तो यह सिर्फ बाजार का नहीं, नीति का भी विषय बन जाता है।
सरकार और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे सट्टेबाजी और फ्यूचर्स ट्रेडिंग पर सख्त निगरानी रखें। बड़े खिलाड़ियों द्वारा कीमतों को कृत्रिम रूप से प्रभावित करने की आशंका को हल्के में नहीं लिया जा सकता। साथ ही आयात नीति, टैक्स स्ट्रक्चर और डिजिटल गोल्ड जैसे नए माध्यमों पर स्पष्ट और संतुलित नियम समय की मांग हैं।
लंबी अवधि में समाधान आयात निर्भरता घटाने, गोल्ड रिसाइक्लिंग और मॉनेटाइजेशन योजनाओं को प्रभावी बनाने में है। इससे न सिर्फ विदेशी मुद्रा पर दबाव कम होगा, बल्कि बाजार में स्थिरता भी आएगी। सबसे अहम बात सरकार को निवेशकों और उपभोक्ताओं को यह संदेश देना होगा कि सोना-चांदी त्वरित मुनाफे का साधन नहीं, बल्कि संतुलित निवेश का हिस्सा हैं।
अंततः सोने-चांदी की मौजूदा तेजी को न तो पूरी तरह साजिश कहकर खारिज किया जा सकता है, न ही इसे केवल बाजार की मजबूरी बताकर छोड़ा जा सकता है। जरूरत है संतुलित हस्तक्षेप की जहां बाजार की स्वायत्तता बनी रहे, लेकिन आम आदमी की जेब और भरोसे की रक्षा भी सुनिश्चित हो। क्योंकि अगर चमक ही आंखें चौंधिया दे, तो अर्थव्यवस्था की राह धुंधली हो जाती है।
*आलेख -अक्षय जैन इंदौर*






