*चांदी की चमक और अर्थव्यवस्था की चिंता *अक्षय जैन*

*चांदी की चमक और अर्थव्यवस्था की चिंता*
✒️*अक्षय जैन*
चांदी के दाम जिस तेजी से ऊपर चढ़ रहे हैं, वह केवल सर्राफा बाजार की खबर नहीं रह गई है। यह बढ़ोतरी अब देश की आर्थिक सेहत और आम कारोबार पर सीधा असर डालने लगी है। कभी गरीब और मध्यम वर्ग की पहुंच में मानी जाने वाली चांदी आज धीरे-धीरे “महंगी धातु” की श्रेणी में खिसकती दिख रही है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, डॉलर की मजबूती, भू-राजनीतिक तनाव और औद्योगिक मांग इन सबका संयुक्त असर चांदी की कीमतों में उछाल के रूप में सामने आया है। भारत, जो चांदी का बड़ा आयातक देश है, उसके लिए यह स्थिति आर्थिक दृष्टि से चिंताजनक है। महंगी चांदी का सीधा मतलब है आयात बिल में इजाफा, विदेशी मुद्रा पर दबाव और अंततः रुपये की सेहत पर असर।
आर्थिक मोर्चे पर देखा जाए तो चांदी के बढ़ते भाव महंगाई को भी हवा दे सकते हैं। सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स और मेडिकल उपकरण जैसे क्षेत्रों में चांदी एक जरूरी कच्चा माल है। कीमत बढ़ने पर उत्पादन लागत बढ़ती है और उसका बोझ आखिरकार उपभोक्ता पर ही आता है। यह ‘कॉस्ट-पुश इंफ्लेशन’ का साफ संकेत है।
व्यवसायिक स्तर पर असर और भी स्पष्ट है। ज्वेलरी सेक्टर में मांग सुस्त पड़ने लगी है। ग्रामीण और मध्यम वर्ग, जो परंपरागत रूप से चांदी की खरीद करता रहा है, अब या तो खरीद टाल रहा है या विकल्प तलाश रहा है। थोक व्यापारियों के लिए स्टॉक रखना जोखिम भरा होता जा रहा है, वहीं छोटे और मझोले उद्योग (MSME) बढ़ती लागत के दबाव में जूझ रहे हैं।
निवेश के नजरिए से चांदी की चमक जरूर बढ़ी है। अनिश्चित माहौल में निवेशक इसे सुरक्षित ठिकाने के रूप में देख रहे हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि पैसा उत्पादक क्षेत्रों से निकलकर धातुओं में सिमट रहा है, जो दीर्घकाल में आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर सकता है।
कुल मिलाकर, चांदी के बढ़ते दाम अर्थव्यवस्था के लिए दोधारी तलवार हैं। निवेशकों के लिए यह आकर्षण हो सकता है, लेकिन उद्योग, व्यापार और आम आदमी के लिए यह चिंता का विषय बनता जा रहा है। सरकार के सामने चुनौती है कि वह आयात नीति, औद्योगिक प्रोत्साहन और वैकल्पिक तकनीकों पर संतुलित कदम उठाए, ताकि चांदी की कीमतों की यह चमक आर्थिक बोझ में न बदल जाए।
*आलेख -अक्षय जैन*
*9425060200*

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