भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की जयंती आज, शिक्षा और सामाजिक चेतना को राष्ट्र का नमन*

*भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की जयंती आज, शिक्षा और सामाजिक चेतना को राष्ट्र का नमन*

ग्वालियर | 03 जनवरी 2026

आज देश सावित्रीबाई फुले को स्मरण कर रहा है — उस साहसी महिला को, जिसने उस दौर में शिक्षा की मशाल थामी जब स्त्रियों का पढ़ना सामाजिक अपराध माना जाता था। भारत की पहली महिला शिक्षिका, समाज सुधारक और नारी शिक्षा की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले की जयंती पर देशभर में उनके विचारों और संघर्षों को नमन किया जा रहा है।

3 जनवरी 1831 को जन्मी सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का औज़ार बनाया। महात्मा ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर उन्होंने बालिकाओं के लिए विद्यालय की स्थापना की और उस व्यवस्था को चुनौती दी, जो स्त्री, दलित और वंचित वर्गों को शिक्षा से दूर रखना चाहती थी।

सावित्रीबाई फुले का संघर्ष केवल विद्यालय खोलने तक सीमित नहीं था। उन्होंने विधवाओं की पीड़ा, छुआछूत की अमानवीय परंपरा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी निर्भीक होकर आवाज़ उठाई। विरोध, अपमान और सामाजिक बहिष्कार के बावजूद उन्होंने शिक्षा के मार्ग को नहीं छोड़ा।

आज देश के विभिन्न हिस्सों में उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि सभाएँ, शैक्षणिक संवाद, व्याख्यान और विचार गोष्ठियाँ आयोजित की जा रही हैं। शिक्षकों और सामाजिक संगठनों द्वारा सावित्रीबाई फुले के विचारों को समकालीन शिक्षा व्यवस्था से जोड़ते हुए यह संदेश दिया जा रहा है कि समानता आधारित समाज की नींव शिक्षा से ही मजबूत होती है।

हाल के वर्षों में सावित्रीबाई फुले के योगदान को संस्थागत मान्यता भी मिल रही है। महिला शिक्षकों और शिक्षा में महिलाओं की भूमिका को केंद्र में रखते हुए उनके जन्मदिवस को विशेष महत्व दिया जाना, उनके विचारों की आज भी प्रासंगिकता को दर्शाता है।

आज जब शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है, सावित्रीबाई फुले का जीवन यह स्मरण कराता है कि यह अधिकार सहज नहीं मिला, बल्कि इसके पीछे साहस, संघर्ष और सामाजिक चेतना की लंबी लड़ाई रही है।
सावित्रीबाई फुले केवल इतिहास की एक विभूति नहीं, बल्कि आज भी शिक्षा और समानता की दिशा में चलने वालों के लिए प्रेरणा का जीवंत स्रोत हैं।

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