आनलाइन व्यापार नहीं, असमान नीति के खिलाफ जंग* *छोटे–मझले कारोबारियों की एकजुटता ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता

*आनलाइन व्यापार नहीं, असमान नीति के खिलाफ जंग*
*छोटे–मझले कारोबारियों की एकजुटता ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता*

आज देश का छोटा और मझला व्यापारी एक ऐसे संकट के दौर से गुजर रहा है, जहाँ चुनौती किसी पड़ोसी दुकानदार या बाजार की प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों की बेलगाम और असंतुलित कार्यप्रणाली से है। यह संघर्ष केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि अस्तित्व, आत्मसम्मान और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रश्न बन चुका है।

विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियाँ भारतीय बाजार में प्रवेश कर भारी पूंजी, आक्रामक छूट, प्राइस डंपिंग और नीति-गत छूट के बल पर बाजार को नियंत्रित कर रही हैं। दूसरी ओर, स्थानीय छोटा व्यापारी टैक्स, लाइसेंस, किराया, श्रम कानून, सामाजिक जिम्मेदारियों और प्रशासनिक दबावों के बीच अपना कारोबार ईमानदारी से चला रहा है। यही असमान नियमों का खेल आज छोटे कारोबार को धीरे-धीरे समाप्त कर रहा है।

यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यह लड़ाई तकनीक या डिजिटल युग के खिलाफ नहीं है। छोटा व्यापारी भी आधुनिक बनना चाहता है, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करना चाहता है, नई पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहता है। विरोध केवल इस बात का है कि जब नियम बनें तो सबके लिए समान हों। यदि ऑफलाइन व्यापारी पर कानून, टैक्स और जिम्मेदारियाँ लागू हैं, तो वही कसौटी विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियों पर भी क्यों नहीं?

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज छोटा व्यापारी बिखरा हुआ है, जबकि बड़ी विदेशी कंपनियाँ संगठित, रणनीतिक और नीतिगत संरक्षण में कार्य कर रही हैं। इतिहास साक्षी है कि जब भी व्यापारी वर्ग संगठित हुआ है, उसने न केवल अपने अधिकारों की रक्षा की है, बल्कि अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दी है। आज फिर वही समय दस्तक दे रहा है।

एक दुकान का बंद होना केवल एक शटर का गिरना नहीं होता। उसके साथ एक परिवार की रोज़ी-रोटी, एक कर्मचारी का भविष्य और स्थानीय अर्थव्यवस्था की धड़कन भी कमजोर पड़ जाती है। यदि यही क्रम चलता रहा, तो आने वाला समय जीवंत बाजारों का नहीं, बल्कि निर्जीव गोदामों और स्क्रीन आधारित खरीदारी का होगा।

आज आवश्यकता है कि छोटे-छोटे दुकानदार, थोक व्यापारी, सेवा क्षेत्र से जुड़े व्यवसायी अपने व्यक्तिगत नुकसान-लाभ से ऊपर उठकर सामूहिक चेतना विकसित करें। बाजार संघ, चेंबर ऑफ कॉमर्स और व्यापारिक संगठनों को एक साझा मंच पर आना होगा। यह लड़ाई किसी एक शहर, एक बाजार या एक संगठन की नहीं, बल्कि देश के करोड़ों छोटे-मझले कारोबारियों के भविष्य की लड़ाई है।

सरकार तक यह स्पष्ट संदेश पहुँचना चाहिए कि ई-कॉमर्स पर प्रभावी नियंत्रण, प्राइस डंपिंग पर सख्त रोक, स्थानीय व्यापार को संरक्षण और विदेशी कंपनियों पर समान नियम लागू करना अब टालने योग्य विषय नहीं रहा। यदि समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया, तो इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम दूरगामी होंगे।

अब चुप रहना एक प्रकार का अपराध होगा। यह समय है शांतिपूर्ण, संगठित और वैचारिक क्रांति का। यह क्रांति सड़क की हिंसा से नहीं, बल्कि एकता, संवाद और दृढ़ संकल्प से आएगी।

छोटे-मझले कारोबारियों से सीधा आह्वान है—
यदि आज हम संगठित नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी हमें क्षमा नहीं करेगी।
यह समय है डर छोड़ने का,
यह समय है आवाज़ बुलंद करने का,
यह समय है व्यापारी एकता की क्रांति का।

*अक्षय जैन*
*संयुक्त सचिव*
*अहिल्या चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज*

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