*एक बार नाकोड़ा आकर तो देखिए…*
✒️ *अक्षय जैन(नाकोड़ा)*
आज का मनुष्य सुविधा-संपन्न है, फिर भी भीतर से अशांत है। दौड़ती दुनिया में मन स्थिर नहीं, सांसें बोझिल हैं, और हृदय खाली-सा महसूस होता है। ऐसे समय में यदि कोई स्थान मनुष्य को स्वयं से मिलवा सके, तो वह केवल तीर्थ नहीं, बल्कि जीवन का पुनर्जागरण बन जाता है। श्री नाकोड़ा तीर्थ ठीक ऐसा ही अनुभव है — जहां कदम पहुंचते हैं और आत्मा जाग उठती है।
श्री नाकोड़ा भैरव कोई मात्र प्रतिमा नहीं, बल्कि भय से मुक्त होने की जीवंत चेतना हैं। उनकी चमत्कारिक मूर्ति के सम्मुख खड़ा होकर यह अनुभव होता है कि जैसे वर्षों से जमी चिंता की परतें स्वयं उतर रही हों। उनकी दृष्टि में कठोरता नहीं, आश्रय है — ऐसा आश्रय, जहां टूटे हुए मन भी सहारा पा लेते हैं।
श्री पार्श्वनाथ प्रभु की पावन धरती पर बैठकर जब पार्श्व इकतीसा का पाठ और भैरव चालीसा की अखंड माला चलती है, तब समय जैसे थम जाता है।अक्षय मन तब तक भरता नहीं, जब तक श्रद्धा की यह धारा अविराम न बहती रहे। आंखें हटती नहीं, हाथ जप छोड़ते नहीं और मन संसार भूलकर भक्ति में विलीन हो जाता है।
आज जब समाज तनाव, अहंकार और असंतोष की आग में जल रहा है, तब नाकोड़ा एक मौन संदेश देता है — मुक्ति बाहर नहीं, भीतर है। चमत्कार केवल पत्थर की मूर्ति में नहीं, बल्कि उस विश्वास में है जो टूटे हुए मन को फिर से जोड़ देता है।
शायद इसी कारण भक्त बार-बार यही कह उठता है—
*“एक बार नाकोड़ा आकर तो देखिए…”*
क्योंकि जो यहां आता है, वह केवल दर्शन नहीं करता,
वह स्वयं से मिलकर लौटता है।






