जैन समाज में समन्वय, समता और महावीर पथ की पुनर्स्थापना

*जैन समाज में समन्वय, समता और महावीर पथ की पुनर्स्थापना*

आज जैन समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ बाहरी चुनौतियों से अधिक खतरा हमारी आंतरिक प्रतिस्पर्धा और मानसिक विभाजन से उत्पन्न हो रहा है। गच्छ, पंथ और संप्रदाय के नाम पर बने मतभेद धीरे–धीरे आस्था को नहीं, अहंकार को पोषित कर रहे हैं। यह चिंतन का विषय है कि हम भगवान महावीर के अनुयायी होकर भी उनके मूल संदेश—अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह—से क्यों दूर होते जा रहे हैं।

परस्पर प्रतिस्पर्धा की यह मानसिकता केवल मंचों और व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे व्यवहार, भाषा और दृष्टिकोण में भी उतर चुकी है। प्रतिष्ठा की होड़, वर्चस्व की चाह और “मेरा गच्छ बड़ा” जैसी सोच ने समाज को भीतर से खंडित कर दिया है। जबकि जैन दर्शन का मूल स्वर यही है । *समन्वय, सहअस्तित्व और समता भाव*

आज आवश्यकता है कि गच्छ और पंथ की दीवारों को संवाद के पुल में बदला जाए। मतमतांतर को विरोध की जगह विचार–मंथन का माध्यम बनाया जाए। आचार्य, पन्यास, उपाध्याय तथा साधु–साध्वी भगवंतों से समाज को केवल अनुशासन नहीं, बल्कि एकता की दिशा भी चाहिए। जब तक धर्मगुरु स्वयं समन्वय की जीवंत मिसाल नहीं बनेंगे, तब तक समाज के स्तर पर यह परिवर्तन अधूरा ही रहेगा।

अक्षय जैन, नाकोड़ा के माध्यम से समग्र समाज के सभी आचार्य, पन्यास, उपाध्याय तथा साधु–साध्वी भगवंतों से एक विनम्र भावनात्मक आग्रह है—
कि वे अपने-अपने संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर भगवान महावीर के सार्वभौमिक पंथ के पथगामी बनें। समाज को “मैं और मेरा गच्छ” की मानसिकता से निकालकर “हम और हमारा जैन समाज” की चेतना प्रदान करें।

भगवान महावीर का मार्ग किसी गच्छ का बंधक नहीं है। उनका संदेश सम्पूर्ण मानवता के लिए है। यदि आज हम जैन समाज के भीतर समन्वय और समता को स्थापित नहीं कर सके, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी।

अब समय आ गया है कि प्रतिस्पर्धा नहीं, समर्पण बने हमारी पहचान।
अब समय है कि भेद नहीं, बोध बने हमारा आधार।
अब समय है कि संप्रदाय नहीं, समग्र जैन समाज हमारी प्राथमिकता बने।

यही भगवान महावीर के प्रति सच्ची आराधना है।

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