*परिवर्तित रिश्तों की परिभाषा : जब समीकरण बदल गए

*परिवर्तित रिश्तों की परिभाषा : जब समीकरण बदल गए*

अस्सी–नब्बे के दशक में वैवाहिक रिश्तों की बातचीत का समीकरण अलग हुआ करता था। लड़के वाले अपनी मांगें, अपनी प्राथमिकताएँ सामने रखते हुए चलते थे—कद, घर-परिवार, शिक्षा, संस्कार, साथ ही दहेज जैसी कुप्रथाएँ भी उस दौर की कड़वी सच्चाई थीं। लेकिन समय बदला, सामाजिक संरचना बदली, और सबसे अधिक बदला—रिश्तों को तय करने का स्वर।

आज तस्वीर बिल्कुल उलट चुकी है। अब लड़की वाले शर्तों की सूची लेकर बैठते हैं और लड़के वालों के सामने एक स्पष्ट ‘चार्टर ऑफ़ कंडीशन्स’ रखा जाता है। यह बदलाव केवल समय का संकेत नहीं, बल्कि मूल्य-व्यवस्था और जीवनशैली में आए गहरे परिवर्तन की कहानी है।

नई शर्तें, नया सामाजिक ताना-बाना
रिश्ता तय करने से पहले लड़की वालों की पहली शर्त—
“हमारी बेटी खाना नहीं बनाती… आपके घर में मेड है न?”

यह आज के शहरी जीवन की हकीकत है, जहाँ घरेलू कामकाज ‘कौशल’ नहीं बल्कि ‘आउटसोर्सिंग’ का विषय बन चुका है। नौकरी करने वाली बेटियों की माँ खुले शब्दों में कहती हैं—
“लड़की जॉब करेगी, करियर नहीं छोड़ेगी।”

यह एक सकारात्मक बदलाव है कि लड़कियाँ करियर को पहचान दे रही हैं। लेकिन वहीं दूसरी ओर रिश्ते की बुनियाद में पहली ईंट ही एकतरफा शर्तों से रखना—परिवारों के बीच संतुलन को कमजोर भी करता है।

रिश्ते से ज़्यादा ‘लाइफस्टाइल कॉन्ट्रैक्ट’
आज रिश्ते की बातचीत में यह भी कहा जाता है
लड़का हर शनिवार–रविवार बेटी को घुमाएगा
साल में दो बार विदेश यात्रा होनी चाहिए

यह विवाह नहीं, मानो किसी वार्षिक पर्यटन पैकेज का अनुबंध हो। रिश्ते की परिभाषा भौतिक सुविधा और आउटिंग पर टिकती जा रही है, जहाँ भावनाएँ, जिम्मेदारी और आपसी समर्पण पीछे धकेल दिए जाते हैं।

*स्वतंत्रता बनाम स्वच्छंदता :*
महीन अंतर धुंधला होता हुआ
लड़की की माँ साफ कह देती है
“लड़की स्वतंत्र ख्यालात की है, पहनावे–विचारों पर कोई रोकटोक नहीं चलेगी।”

निस्संदेह, हर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता का अधिकार है। परंतु जब विवाह से पहले ही रिश्ते का आधार ‘मैं जैसा हूँ वैसा ही रहूँगी’ के कठोर दायरे में बाँध दिया जाए, तो यह साझेदारी नहीं, शर्तबद्ध सह-निवास बन जाता है।

स्वतंत्रता तब तक सुंदर है, जब तक वह परिवार की मर्यादा और पारस्परिक समझ के साथ तालमेल बिठाए। किंतु आज ऐसी स्वतंत्रता को जन्मसिद्ध अधिकार की तरह प्रस्तुत किया जाता है घर-परिवार की परंपराएँ, संस्कार, संयुक्त जीवन की गरिमा सब दकियानूसी कहलाने लगे हैं।

*समस्या का मूल : बराबरी नहीं, ‘बड़ेपन’ की होड़*
रिश्तों में समानता आवश्यक है। परंतु आज दोनों पक्ष समानता नहीं, बल्कि अपने ‘प्रभाव’ के प्रदर्शन में जुटे हैं।
एक समय लड़के वाले हावी होते थे, अब लड़की वाले।
लेकिन रिश्ते में किसी एक पक्ष का हावी होना ही असंतुलन की शुरुआत है।

समाज के प्रबुद्धजनों को अपने स्तर पर अभियान चलाकर समाज संस्कार पवित्रता को अक्षुण्ण रखना होगा और समझाइश कैंप लगाना होगा। बताना होगा कि विवाह न तो एकतरफा अनुबंध है और न ही शर्तों का बाजार।
यह जीवन की साझेदारी है जहाँ
दो परिवार ,दो संस्कृतियाँ दो जीवन-शैलियाँ
एक मध्य बिंदु पर मिलती हैं।

यदि शुरुआत ही शर्तों के पुलिंदे से होगी, तो भविष्य में समझ और सम्मान की गुंजाइश कहाँ बचेगी?

समय की मांग यही है कि रिश्तों को शर्तों से नहीं, संवाद और संवेदना से बनाया जाए।
संतुलन, परस्पर सम्मान, और जिम्मेदारी इन्हीं से गृहस्थ जीवन की नींव मजबूत होती है।
अन्यथा विवाह एक साझेदारी नहीं, केवल अपेक्षाओं के बोझ तले दबा हुआ समझौता बनकर रह जाएगा।
✒️ *अक्षय नाकोड़ा*

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