*मोहन जोदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता पर व्याख्यान*
*ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम से ही देश का नाम भारत पड़ा*
कुलकरों के पश्चात ऋषभदेव हुए जिन्होंने धर्म की स्थापना की इनका स्थान जैसा जैन पुराणों में है वैसा हिंदू पुराणों में भी पाया जाता है वहां भी वह इस सृष्टि के आदि में स्वयं भी मनु से पांचवीं पीढ़ी में हुए ऐसा बतलाया गया है और वह इसके अवतार गिने जाते हैं उनके द्वारा धर्म का जैसा प्रचार हुआ उसका भी वर्णन है जैन पुराणों में कहा गया है कि ऋषभदेव ने अपनी ज्येष्ठ पुत्री ब्राह्मी के लिए लेखन कला का आविष्कार किया उन्हीं के नाम पर इस आविष्कृत लिपि का नाम ब्राह्मी लिपि पड़ा, इतिहासकार ब्राह्मी लिपि के नाम से भली-भांति परिचित है, आधुनिक नागरी लिपि का यही प्राचीन नाम है, ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र का नाम भारत था जो आदि चक्रवर्ती हुए, भरत चक्रवर्ती का नाम हिंदू पुराणों में भी पाया जाता है यद्यपि उनके वंश का वर्णन वहां कुछ भिन्न है इन्हीं भरत के नाम से यह क्षेत्र भारतवर्ष कहलाया
सिंधु सभ्यता के बाबद पूरे विश्व में यह धारणा गहराई से अपनी पेठ बनाए हुए हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के लिखित ऐतिहासिक प्राचीन साहित्य में इस प्राचीन सभ्यता का कहीं भी किसी प्रकार का उल्लेख नहीं है, इसी कारण सिंधु सभ्यता के लिए यह माना जाता है कि यह एक पूर्ण रूपेण पुरातात्विक खोज है एक बात विशेष उल्लेखनीय है कि जैन धर्म भी भारत का एक अत्यंत प्राचीन धर्म है जो आज भी जीवंत एवं प्रचलित धर्म है परंतु इस और इतिहासकारों एवं पुरातत्व वेदों का ध्यान कम ही गया है
श्री जैन प्राच्यविद्या अनुसंधान संगठन द्वारा आयोजित संगोष्ठी में राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री देवेंद्र सिंघई ने अपने विचार व्यक्त किये,
इस अवसर पर अनुरागनगर मे आयोजित कार्यक्रम मे चुनाव अधिकारी श्री मनीष नायक ने संगठन के सर्वानुमति से मनोनीत राष्ट्रीय पदाधिकारियों की घोषणा की, तदनुसार संरक्षक एम के जैन, अध्यक्ष देवेन्द्र सिंघई, उपाध्यक्ष डॉ मनीषा चेलावत, महामंत्री आलोक जैन, मंत्री मीना नाहरा, कोषाध्यक्ष पंकज जैन के अलावा प्रीति पाडलिया को कार्यकारिणी सदस्य मनोनीत किया,
अतिथियों का स्वागत श्वेता जैन, किरण मेहता, मनोज जैन, विक्रम टोंग्या, अनुभा जैन, सुषमा जैन, रेनु जैन, ईशा जैन किया






