जैन मंदिर, प्रतिमायें, मण्डप, शिल्प प्राच्यविद्या के अनुरूप हों

*जैन मंदिर, प्रतिमायें, मण्डप, शिल्प प्राच्यविद्या के अनुरूप हों*

जैन प्राच्यविद्या एक ऐसा क्षेत्र है जो जैन धर्म, दर्शन, इतिहास और संस्कृति के अध्ययन पर केंद्रित है। यह विषय जैन धर्म के मूल सिद्धांतों, जैसे कि अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्म-संयम, के साथ-साथ जैन दर्शन के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि स्यादवाद, अनेकांतवाद और कर्मवाद, का अध्ययन करता है, श्री जैन प्राच्यविद्या अनुसंधान संगठन द्वारा लालबाग लाइफ मे आयोजित संगोष्ठी में मुख्यअतिथि एम के जैन ने अपने उद्गार व्यक्त किये, आपने कहा कि प्राच्यविद्या के अन्तर्गत
जैन धर्म का उद्भव और विकास, जैन तीर्थंकरों की जीवनियाँ और जैन धर्म के प्रमुख संप्रदाय, स्यादवाद, अनेकांतवाद और कर्मवाद ग्रंथों, आगम, सूत्र और टीकाएँ, जैन कला और वास्तुकला ,मंदिरों, मूर्तियों का
जैन धर्म की प्राच्यविद्या का अध्ययन करने से हमें जैन धर्म और संस्कृति के बारे में गहराई से समझने में मदद मिलती है। यह विषय हमें जैन धर्म के मूल सिद्धांतों और उनके व्यावहारिक अनुप्रयोगों को समझने में मदद करता है
इस अवसर पर प्राच्यविद्या विद्वान ईशा जैन का अभिनन्दन शॉल, श्रीफल, प्रशस्तिपत्र से किया गया, प्रीति पाडलिया, किरण मेहता ने सम्बोधित किया, संचालन रेनु जैन ने किया एवं आभार सुषमा जैन ने माना
सादर प्रकाशनार्थ प्रेषित

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